Posted by: Rajesh Shukla | August 8, 2010

साँसों की माला पे


नुसरत फतेह अली नें सूफी कव्वाली को इस्लामिक दायरे से निकालकर अन्तर्राष्ट्रीय ही नहीं बनाया बल्कि उसे सबके लिये सुनने लायक बनाया, उसे एक सेक्यूलर स्वरूप दिया। वे जिस कौव्वाल परिवार से आते थे वह छः शतकों से कव्वाली की परम्परा का वाहक है, गायकी का कुछ अद्भूत अन्दाज उन्नत हुआ था जिसकों नुसरत नें लोगों तक पहूँचाया। नुसरत के पिता फतेह अली खान भी एक अच्छे कौव्वाल थे। नुसरत तक पहूँचकर कव्वाली सिर्फ कव्वाली नहीं रह जाती उसका फार्म कमोवेश बदल जाता है, एक नया रूप ग्रहण करता है जिसमें क्लासिकल संगीत बहुत गहरे अन्तर्गुन्थित है। जिस तरह उनका ईप्रोवाजेशन है जिस तरह खयाल स्टाईल को वे कव्वाली में उतारते हैं वह अनोखा है, यह उनकी इस संगीत को देन हैं।

नुसरत फतेह अली ने जिसतरह सें कव्वाली को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान और स्वीकार्यता दिलवायी वह ऐतिहासिक है। शादी ब्याह तथा सूफी मजारों तक सिमटा यह संगीत जिस तरह से अन्तर्राषट्रीय बनता है वह अपने आप में एक बहुत बडी कहानी है तथा नुसरत के महान संगीतकार और गायक होने का बडा सबूत है। संगीत का यह सूफियाना रूप अपनी देशी सीमा को तोडकर दुनिया भर में दिलो पर राज करने में सक्षम हुआ है। उन्होने अपने संगीत से पूरब और पश्चिम को जोडने का भी काम किया है यह ऐसे ही नही है कि पीटर गैब्रियल, पर्ल जैम, माईकल ब्रुक, जोनाथन ऐलियास इत्यादि बहुत से पाश्चात्य संगीतकारों नें उनके साथ मिलकर काम करने तथा उनके साथ कन्सर्ट करनें में अपना सौभाग्य समझा, उन्हें दिलों से लगाया और गुरू माना।

फिलहाल “साँसों की माला पे सिमरू मैं पी का नाम” नुसरत फतेह अली की इस सुन्दर बन्दगी को सुनिये, सुरदास के इस वैष्णव भजन को जिस तरह से उन्होने सूफीयाना अंदाज में गाया है वह दुर्लभ है। वास्तव में सूफीइज्म का वैष्णविज्म से बहुत गहरा नाता है दोनों एक दूसरे से बहुत गहरे जुडते है। सूफीयों में जो भक्ति और रसिकता है बहुत हद तक वैष्णवों की ही देन है। कभी मौका और समय रहा तो इस पर जरूर प्रकाश डालेंगे।

–राजेश

Perhaps this last one his first version.

you can play or download full record here .. http://www.divshare.com/download/12217845-a3d

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