Posted by: Rajesh Shukla | August 8, 2010

जनसत्ता के हवाले से छिनाल प्रकरण पर चर्चा


जनसत्ता में अशोक बाजपेयी और मैत्रेयी पुष्पा दोनो का आक्रामक लेख आज चर्चा का विषय बन सकता है। अशोक बाजपेयी नें वी एन राय और कालिया सहित हिन्दी के भीष्मपितामह प्रख्यात समालोचक सिंह की भी खुलकर आलोचना की है। उन्होने अफसोस जताते हुये लिखा है कि हिन्दी में हिंदी की साहित्य-संस्कृति और शिष्टता के सभी प्रतिमानों को लतियाता-रौंदता छिछोरेपन का एक दौर चल निकला है जिसकी एक मिसाल यह छिनाल प्रकरण है। हिंदी लेखिकाओं को ‘छिनाल’ कहना, ‘कितनी नावों में कितनी बार’ (अज्ञेय का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह) के वजन पर ‘कितने बिस्तरों पर कितनी बार’ जैसी उक्ति कर उनके बीच छिनालपन की होड़ का आरोप लगाना और ऐसे इंटरव्यू को छापते हुए ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक का उसे प्रकाशित सामग्री में सबसे बेबाक कहना किसी भी प्रतिमान से आलोचना नहीं, गाली देना ही कहा जा सकता है। सरकार के दबाव में विभूति नारायण राय ने माफी मांगकर अपनी नौकरी तो बचा ली, लेकिन उनकी इज्जत घूरे पर पड़ी है। उन्हें लेखकीय स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन अगर वे मानते हैं कि उसका ऐसा अतर्कित दुरुपयोग कर वे निष्कलंक निकल जाएंगे तो इसे मूर्ख विश्वास ही कहा जा सकता है। ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना सिर्फ स्त्रियों का नहीं, समूचे साहित्य-जगत का अपमान करने के बराबर है। बाजपेयी नें कुलपति पद के दुरूपयोग का आक्षेप लगाये हुये कहा है कि इस पद पर वर्धा मे रहते हुये मैने गुजरात के नरसंहार के विरोध में लेखकों-कलाकारों को एकत्र किया था, सार्वजनिक वक्तव्य दिये थे और राष्ट्रपति को ज्ञापन आदि सौंपे थे। लेकिन यह अब व्यक्तिगत निजी साहित्यिक भड़ास निकालने या अपनी कोई कल्पित वीरगाथा लिखने के लिए किया जा रहा है। नामवर जी को आडे हाथो लेते हुये उन्होने लिखा है कि  यह दुखद और किसी हद तक शर्मनाक है कि नामवर सिंह जैसे ‘भद्र’ और वरिष्ठ आलोचक ने अभी तक इस मसले पर न तो कुछ कहा है, न ही कुलाधिपति पद से इस्तीफा दिया है। उन्होंने कुलाधिपति की हैसियत में कुलपति से कोई जवाब तलब तक नहीं किया है। उधर जिस लेखिका को लेकर यह सारा प्रसंग छिडा है तथा जिसका गहरा सम्बन्ध  राजेन्द्र यादव से माना जाता है ने भी आक्रमण किया है। गौरतलब हो कि इस लेखिका को लेकर उसके शुरूआती दिनो में हिन्दी साहित्य में बडी कनाफूसी चलती रही है । उसका बौखलाना जायज भी है ।
मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा है, नहीं पोल खोली है कि किस तरह विभूति नारायण रविन्द्र कालिया सें गहरे जुडे हैं और वागर्थ से लेकर नया ज्ञानोदय तक छप रहे हैं। इस तरह की चीजे छापना उनका प्रिय शगल है।  जिनके अपमान के लिए उनका जी मचलता है, उस पर बाकायदा योजना बनायी जाती है। अपने दल के एक एक सदस्य के आनंद का ध्यान रखा जाता है। उचित समय तय करना और पत्रिका को उस खास मकसद से निकालने के लिए साहित्यिक बहानों को खोजा जाता है कि हर मौजपरस्त दिल बाग-बाग हो जाए और उस अंक की इतनी बिक्री हो कि मालिक लोग दांतों तले उंगली दबा लें। इस बेवफाई अंक की तुलना उन्होने अमृत से की जिसने पत्रिका के पन्नों को प्रक्षालित कर दिया और प्रसाद की तरह बांटा  और बेचा  गया। मैत्रेयी नें इनकी सामन्तवादी प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालते हुये  कहा कि स्त्रियां सदा से सामंतों के मालिकाना हक में शुमार मानी जाती रही हैं, पुलिस अधिकारी रहे हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय इससे अधिक कुछ क्यों जानें और कैसे जानें? पुलिस डंडा चलाने में उस्ताद होती है, सो उन्होंने अपनी उस्तादी का बेहतरीन नमूना पेश कर दिया। पत्रिका में फतवा जारी मिला उन स्त्रियों को, जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में आकर कलम उठायी है। मालूम हुआ कि उनका लेखन अपने आप में गुनाह है क्योंकि वे विभूति नारायण राय द्वारा उसी श्रेणी में रख कर देखी जा रही हैं, जिस कोटि को तिरस्कार और नफरत से देखा जाता है। उन्होंने औरतों की बदचलनी के लिए जो नाम दरपेश किया, उसको सुन कर रास्ता चलती मामूली औरत भी अपना संतुलन खो बैठे, लेखिकाओं की तो बात ही क्या है? माफीनामे को अनिचित मानते हुये लेखिका नें स्पष्ट किया है कि माफीनामा, यह शब्द औरतों को रास नहीं आया। बिना शर्त के क्षमा याचना, निकल जाने का सरलीकरण नहीं तो और क्या है? लेखिकाएं क्या अब भी इतनी भोली, नादान, आज्ञाकारिणी, अनुगामिनी समझी जा रही हैं कि इस फैसले पर वे फूली नहीं समाएंगी? सोच लेंगी कि बस हमारा संघर्ष यहीं तक था? अपराधी के लिए माफी और इस जगह नाइंसाफी नहीं तो और क्या है? यह मैं इसलिए कह रही हूं कि अक्सर पति रूपी व्यक्ति पत्नी के प्रति क्रूर से क्रूर व्यवहार करता है, बर्बर से बर्बर यातना देता है और थोड़ी ही देर बाद उसके पांव पकड़ लेता है, माफी मांगता है। यह आचरण फिर से जुल्म करने के लिए तैयार होना है। लेख में उन लेखिकाओं की भी भर्तसना की गई है जो विभूतिनारयण राय के वक्तव्य को वैध ठहरा रही हैं। वह कहती हैं कि इन महिलाओ को मर्दाना रुतबा कंधों पर ढोने की आदत पड़ी हुई है। रोटी-कपड़ा आखिर मालिक ही देता है, इस मान्यता को वे मिटने तो क्या क्षीण तक नहीं होने देंगी। आज भी हम उनकी दुनिया के रूप में गुलाम भारत की ‘शानदार’ तस्वीर देख सकते हैं।

इन सबके बीच इतने दिनों से गरम इस मुद्दे पर एक भी अच्छा लेख पढने को नही मिला, सिवाय गालीयाना प्रतिक्रिया के। यह फेमिनिस्म  सिर्फ गाली और माफीनामे तक सीमित नही रहना चाहिये। इस छिनाल वक्तव्य का फेमिन्स्ट लेखन द्वारा जबाब दिया जाना चाहिये। जब यह प्रकरण उठा है तो उनके लेखन पर बात की जाय क्योंकि यदि कोई लेखक सामंतवादी सोच का है तो उसका लेखन इससे बच नहीं सकता । यदि कोई पेटी बुर्जुआ सोच का कवि है तो उसकी कविता में वह ऐस्थेटिक्स बजबजायेगा। ऐसे लेखक की उसके लेखन की आलोचना द्वारा दण्डित किया जाना चाहिये। यह गाली गलौज बहुत हो गया साहित्य के अपनें साहित्यिक ठंग होने चाहिये। मुझे तो यह तरह से छिछोरपन और नंगई से ज्यादा नहीं लगता कि जब किसी की पब्लिकली भर्तस्ना की जा चुकी है तथा जिसने समाज के सामने अपनी गलती स्वीकार की है उसे गोली मार देने के लिये कहा जा रहा है।  या बार बार वही दोहराया जा रहा है। यदि वी एन राय या रविन्द्र कालिया सामन्तवादी लेखक हैं तो उन्हे साहित्यिक आलोचना से नंगा किजिये वे  स्वयं ही मर जायेगे। एक लेखक के लिये उसकी साहित्यिक मौत सबसे बडी मौत होती है। मेरा हिन्दी साहित्य से कोई लेना देना नही है लेकिन मेरा यह मत है कि अब गाली गलौज टाईप का पत्रकारिता लेखन बन्द होना चाहिये और इस मुद्दे पर साहित्यिक हस्तक्षेप की शुरूआत की जानी चाहिये।

–राजेश शुक्ला

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Responses

  1. देखिये छिनाल प्रकरण बडा ग्रेट है। साहित्यिक छिनालो का भी जबाब नही है और उस पर तमाम मूर्ख है ताल ठोक रहे हैं। अब छिनाल को छिनाल न कहोगे तो क्या कहोगे?

  2. मै सहमत हूँ आपसे सुमन जी:-)

  3. यह बात ठीक ही है। बेवजह गैगबाजी हो रही है क्योकि बिना इसके तो कोई रह नही सकता बहुतो की रोजी रोटी लेखन से नही गैंगबाजी से चलती है।

  4. मुझे यह लग रहा है कि साहित्य अब रहा नही यह एक तरह से किच हो गया है। जिस तरह से लेखन हो हरा है वह किच से ज्यादा नहीं है और जो किच कर रहा है वह किचकिच ही करेगा-छिनालपन पर उतर आये तो क्या कहा जा सकता है।

  5. इन मतों से पूरी तरह सहमत हूँ।


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