Posted by: Rajesh Shukla | August 7, 2010

देहवादीयों के खिलाफ


आज दैनिक भास्कार न्यूज पेपर में छिनाल प्रकरण पर भरपूर सामग्री छपी है सुबह उठकर मैने सबसे पहले यही पढा । विभूति नारायण का वक्तव्य भी छपा है जिसमे उन्होनें कहा है कि मैंने शब्द का प्रयोग मुद्दे के सन्दर्भ में किया है। कुछ लोग अन्य कारणों से इस मामले को जिन्दा रखना चाहते है। मैने माफी माँगी है और महिला मित्रों नें मेरी मरम्मत की इससे मेरे मन में उनका और भी सम्मान बढा है। जिस देह के मुद्दे पर मैने बात की है उसपर बहस होनी चाहिये। स्त्री मुक्ति में अपनी देह पर स्त्री अधिकार एक महत्वपूर्ण तर्क है पर और भी गम हैं मुहब्बत में जमाने के सिवा। मेरा मानना है कि भारत के सन्दर्भ में स्त्री मुक्ति से जुडे और भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर बहस होनी चाहिये। उन्होने गुजरात का भी नाम ले लिया और खेद जताया कि यदि उससे बचना है जिसमे महिलाओं ने अल्पसंख्यको के संहार मे भाग लिया था ।(तो बहस कों विस्तार देना होगा।) पर उधर निर्मला जैन ने कुलपति के साक्षात्कर को स्त्रियो के पक्ष मे बताया है वे लिखती है “विभूति नारायण राय ने इस इन्टरव्यू में साफ कहा है कि देह की स्वतंत्रता का नारा देकर कुछ लेखक और सम्पादक स्त्री विमर्श को मुख्य मुद्दे से भटका रहे हैं। इस सन्दर्भ में उन्होने हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव की कटु आलोचना की है और दूधनाथ सिंह की नमो अन्धकारम
कहानी को स्त्री विरोधी बताया है। उन्होने यह भी कहा है कि देह विमर्श करने वाली स्त्रियाँ भी स्त्री विमर्श को शरीर तक केन्द्रित कर रचनात्मकता को बाधित कर रही है। उन्होने इन्टरव्यू में पितृसत्तात्मक समाज का विरोध किया है।

हलाँकि इसके उलट पंकज विष्ट ने यह आक्षेप लगाया है कि साक्षात्कार यह पूरा प्रयोजित था और जान बूझकर पत्रिका के प्रचार प्रसार के लिये यह सब किया गया । कालिया भी उतने ही दोषी है। मैनेजर पाण्डे ने यह लिखा है कि विभूति ने जो बार बार यह कहा कि छिनाल शब्द प्रेमचन्द ने अनेको बार किया तो उन्हे प्रेमचंद को फिर से पढना चाहिये और यदि मान भी लिया जाय कि प्रेमचन्द ने उस शब्द का इस्तेमाल किया तो क्या इससे उन्हे यह अधिकार मिल जाता है कि वह आज इस शब्द का इस्तेमाल कर उनका अपमान करें। कबीर ने कई जगह सती प्रथा को महिमा मण्डित किया तो क्या हमें इसका समर्थन करना चाहिये? इधर कृष्णा सोबती ने लिखा है कि ऐसे आपत्तिजनक शब्द उस स्त्री के लिये जिसने अपनी बौद्दिक उर्जा से अपना स्थान प्राप्त किया है अपमान जनक है। क्या आप चाहते है स्त्री लेखक के रूप मे काम न करे। आज इस समय पुरूष हडबडाहट मे है (मतलब यह “छिनाल” इस बौखलाहट की अभिव्यक्ति है) परिवार रूपी संस्था मे भी स्त्रियो को लेकर चिंता सता रही है। आप सिर्फ अपने घर की तरफ देख रहे हैं, ठीक नहीं है। यह एक सरसरी दृष्टि से पेपर का सार है ।

कुल मिलाकर मुझे यह लग रहा है कि यह मुद्दा वाम बनाम दक्षिण है यदि साक्षात्कार में राजेन्द्रयादव और दूधनाथ सिंह जिन्हे निर्मला जैन देहवादी कहती है को लेपेटा नही गया होता तो शायद यह मुद्दा इतना बडा नही बना होता। दक्षिणपंथी स्त्रीविमर्श बाजारवादी है वह तो यह चाहता ही हैं कि स्त्री की देह बाजार में और सहज रूप से उपलब्ध हो, विमर्श कुछ भी हो सकता है। वैसे भी राजेन्द्रयादव इस देहवाद के लिये कुख्यात हैं शायद हो न हो विभूति का आक्रमण उन्ही की तरफ और उनके गिरोह की लेखिकाओं की तरफ था। यदि यह बात है तो इसे ठीक से उठाया जाना चाहिये था कन्टेक्ट मे बात होनी चाहिये।

–राजेश शुक्ला

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Responses

  1. आप सही कह रहे है यह मुद्दा वास्तव वाम और दक्षिण ही है इसका बहुत स्त्रीविमर्श से लेना देना नही है। और यह स्त्रि विमर्श है भी नही बल्कि वाम और दक्षिण विमर्श है, जिसमे यह दक्षिणपंथी देहवादी विमर्श को बढावा दे रही लेखिकाओ और लेखको पर आक्रमण था जिससे वे तिलमिला गये। आपकी पोस्ट से तो मुझे यही लग रहा है।

  2. सर यदि यह विमर्श वाम-दक्षिण में अंटका पडा है तो निःसन्देह मैं वाम रहूँगी-मै बाजारवाद के खिलाफ हूँ। विमर्श बाजार की रण्डी तो कमसे कम नहीं बनेगा।

  3. मेरा मानना है कि ऐसे लोगो को साहित्यिक रूप से जलील करना चाहिये-खूब लिखा जाना चाहिये। यही बहुत बडा दण्ड एक लेखक के लिये होता है। जहाँ तक शब्द का सवाल वह गलत है और पब्लिकली माफी माँग ली है तो काफी है। बाकी साहित्यिक आलोचना से निपटा जाना चाहिये।

  4. Agreed with this discussion.

  5. koi sandeh nahi ki yeh batchit ke liye zaroori parivesh tayyar karne me sahayak hoga. is bahas ko lekar content par bat honi chahiye.


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