Posted by: Rajesh Shukla | August 5, 2010

नहीं जी छिनाल प्रकरण अभी भी प्रकरण बना हुआ है


नहीं जी हमारा सोचना गलत था कि वीसी विभूति नारायण द्वारा उठाया गया प्रकरण माफीनामे के साथ खत्म हो गया है। यह खत्म नहीं हुआ है क्योंकि जिनने इसकी इस तरह से हवा निकाल दी थी वे छद्म भेडिये अभी भी संस्कृति की ठेकेदारी कर रहे हैं और विपक्ष इसे बर्दास्त नहीं करना चाहता। जिन भाईयों ने मुद्दे को जोर शोर से उठाया था वे हरगिज पीछे नहीं हटना चाहते।  कुलपति विभूति नारायण का माफीनामा  इसका हल कत्तई नही है जब तक की वे सडक की खाक न छानने लगे क्यों नहीं जिसने स्त्रियों के चरित्र और उनकी बौद्धिक प्रखरता का इतना भद्दा मजाक बनाया हो उसे तो जीने का भी हक नहीं होना चाहिये। हलाँकि यह कुछ तालिबानी तेवर है जिससे कोई भी बुद्दिजीवी सहमत नही होगा, जनतंत्र में इतनी उदारता तो होनी ही चाहिये कि प्रतिपक्षी को सुधरने का एक दो मौका  मिले। फिर भी..

प्रकरण को फिर से पटरी पर लाने की भरपूर कोशिस हो रहीं है लेकिन इस बार बन्दूक की नाल जसम और नया ज्ञानोदय कें सम्पादक रविन्द्र कालिया की तरफ तनी हुई है। नवयुवक लेखक समूह गोलबन्द है और धार पिजो रहा है, हस्ताक्षर किये जा रहे हैं।  जाओगे कहाँ बच्चू यदि तुम्हारा गोल बानरों का है तो हम चिम्पैन्जीयों के समूह हैं जो बानरो का शिकार बडे मजे से करते है-चिम्पैंन्जियों को गोश्त बहुत पसन्द है। जसम कें कुछ लोगो का नाम शीर्ष पर रखा गया है और नाम ले लेकर उनको गरियाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। चश्मुल्ली प्रणयकृष्ण का नाम सर्वोपरि है और उनपर यह आक्षेप है कि इस छिनाल प्रकरण की उनने हवा निकालने में अग्रणी भूमिका निभाई।  कुछ लोगों के लिये तो यह भी एक बडी  भारी यन्त्रणा के रूप में सामने आई है -मुद्दे का इतनी आसानी से ठंडा हो जाना मुद्दे को उसकी परिणति तक ले जाने वालों के लिये तो बहुत बडी तकलीफ का कारण है। कथनों के कंकाल पत्रिकाओं से बाहर निकाले जा रहें है और साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किये जा रहें है।

कंकाल दर कंकाल यह विमर्श जारी रहना चाहिये। तुमने वहाँ यह कहा था अब तुम यहाँ इसे भुगतो।  साहित्यिक कंकाल बडा पैराडाक्सिकल है यह कब शरीर का रूप धर लेगा कहा नहीं जा सकता, नामवर जानते हैं इसकी माया। नवयुवक साहित्यकारों को नामवर जी की राय जरूर लेनी चाहिये थी , वह इसकें भीष्म पितामह हैं। बहुत कम लोग जानतें हैं कि कंकाल को शरीर में किस तरह अवतरित किया जाय, वर्चुअल को रीयल बनाने की कला सबको नहीं आती । खैर प्रकरण जारी है और वृन्दा करात भी इस प्रकरण में एक पंचरिस्ट के रूप में शरीक हैं । उन पर भी स्त्रीविमर्श कें खिलाफ काम करने  तथा मर्द सत्ता का साथ देनें का घोर अपराध करनें का आक्षेप हैं।  कुलपति से चली छिनाल कथा कालिया से होते हुये प्रणय कृष्ण और वृन्दा करात तक पहूँची है। लेफ्ट को कोसनें का सिलसिला शुरू है, होना भी चाहिये ये पेटी बुर्जुआ नैतिकता और वामपन्थ किसीलायक है भी नहीं;  इस छद्म पेटी बुर्जुआ वाम से तो  बेहतर  खालिस पेटी बुर्जुआजी है। वैसे भी तमाम पेटी बुर्जुआ बुद्दिजीवी जो न्यूज पेपरों में बैठे हैं अब उनके लिये लेफ्ट का कोई मतलब होना भी नही होना चाहिये क्योंकि मोदी का कार्पोरेटिज्म और संस्कृति की धूम मच रही है। सब कुछ कलरफुल है बल्कि कलर्स है।  एन डी  टी वी का जय जय शनिदेव के साथ एक पेटीबुर्जुआ टाईप प्रगतिवाद भी है जिसका प्रतिनिधित्व विनोद दुआ टाईप के बुद्दिजीवी करते हैं। और उन बुद्दिजीवीयों के बारे में क्या कहें जो पूँजीपतियों की सेवा करने में अपना धन्यभाग मानते हैं। कोई किसी को गरियाने लायक आज कहाँ है? किस बुद्दिजीवी के पास नैतिकता बची  है ? जब स्वयं बौद्धिक क्रिया भी पूँजीपतियो के रहमों करम पर जिन्दा हो तब एक पेटीबुर्जुआ टाईप के विमर्श के इतर कोई अन्य की गुंजाईश भी नहीं बनती !

इन सबके बीच इस छिनालवादी विमर्श की गति क्या होगी अभी तय किया जाना बाकी है। चिम्पैन्जियाना आक्रमण की तैय्यारी हो रही है , माँग के अनुसार मिस्टर रविन्द्र कालिया अपने गिरोह कें साथ मैदान में उतरें या अपनें पद से इस्तिफा दें-ये दो ही विकल्प हैं। हिन्दी साहित्य  के इन विमर्शों से  दूर दूर तक कोई सम्बन्ध न होने के बाद भी इतना तो मुझें पता है कि कालिया इत्यादिं बहुत से गुरिल्ला युद्ध लड चुकें हैं और जानतें है कि कई बार संख्या मायने नहीं रखती बल्कि स्ट्रेटेजी मायने रखती है। हम देख ही चुके हैं कि किस तरह स्ट्रेटेजी से  कुलपति राय अपना पद बचा ले गये है। कालिया का मूव किस तरह का होगा यह देखने की बात होगी। हमारी कुल चिन्ता प्रकरण का एक शुभ खात्मा है।

–राजेश शुक्ला

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Responses

  1. LOLZ LOZ यह तो बढिया विमर्श निकला। लेकिन छापामार युद्द करने वाले मूव तो जानते होंगे नामवर का न बोलना भी बहुत बडी बात है।

  2. सर जी इस पर समय न लगाईये समय बहुत कीमती है।

  3. सही कहा यह विमर्श कंकाल दर कंकाल हिन्दी मरं बहुत सारे लोग इसे ही विमर्श की संज्ञा देते है और इसे ही तलाशते रहते है। बहुत कर दुःख भी होता है।


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