Posted by: Rajesh Shukla | August 4, 2010

छिनाल प्रकरण का खात्मा


अन्ततः जोरशोर से उठाया गया छिनाल प्रकरण माफीनामे के साथ खत्म हो गया। यह कहा जा रहा है कि इस प्रकरण को इस तरह से खत्म करने के पीछे वामपंथी जन संस्कृति मंच (जसम) वाले हैं। कुछ का संदेह सी पी एम की वृन्दा करात पर है। हर कही खबर बन चुके इस प्रकरण को जिस तरह से उठाया गया था उससे लगता था इससे कोई महती परिवर्तन होने वाला है। स्त्रीविमर्शकारों मे ही हलाँकि इसको लेकर दो राय सामने आई एक हार्डकोर दूसरी लीबरल और लीबरल वर्ग की राय ही सामने आई, भई क्यो न हो यह देश लीबरल जनतंत्र है।

लगातार मुद्दे उछालकर वेबसाईट रेटिंग बटोरने की फिराक मे कई वेबसाईट चलाने वाले छुटभैय्ये लागातार अपडेट देते रहे तथा मुद्दे को जिलाये रखने की कोशिस करते रहे लेकिन भारतीय जनतंत्र में बडे से बडे मुद्दे चन्द दिनों मे दम तोड देते हैं तो इसकी क्या औकात थी।  कपिल सिबाल ने कुलपति को बुलाकर आँख मारते हुये कहा कि यार माफी मार कर खतम करो बवाल, कुलपति विभूति नारायण थोडा ना नुकुर करने के बाद मान गये , भला इसमें क्या  बडी बात है सारे नेता यह काम करते हैं।  विभूति नारायण राय नें हंसते हुये छिनालों से माफी माँग ली, बहुत नाराजगी होने पर भारतीय मर्द समाज यही करता है। अपनी वीवी को  भी लोग छिनाल कह कर गरियाते हैं जब बहुत नाराज हो जाती है तो माफी माँग लेते है लेकिन छिनाल कहने की आदत बनी रहती है और वीवी को सुनने की, धीरे धीरे यह गाली न होकर सामान्य शब्द हो जाता है। फक् यू यह अंग्रेजी में आम हैं , बिच यह आम हैं, फक् करते समय बिच कहने से पाश्चात्य स्त्रियों को ज्यादा ताव आता है वे इसकी डिमाण्ड करती है। अब भारत में इसका प्रचलन जोर शोर से हो रहा है। यह अब बहुत आम शब्द हो गया है और बहुत सहज रूप से प्रयोग किया जाता है। गाँवो में छिनाल नहीं कहा जाता बल्कि छि-नार कहा जाता है, जो नारी बहुत पुरूषो के संग रमण करती है उसके लिये है -छिः-नार शब्द  है, शुद्ध हिन्दी में यह छिनाल हो गया है। हलाँकि यह शब्द पुरूषों के लिये भी अलग ठंग से प्रयोग किया जाता है ऐसे पुरूषों को जो बहुस्त्री भोगी हैं उन्हें छिनरा कहा जाता है। कृष्ण के लिये इस शब्द का प्रयोग ब्रज भाषा में है।

खैर जो भी हो तमाम नेट विमर्शो को देखने के बाद कहा जा सकता है कि प्रकरण में बहुत दम नहीं था इसलिये  माफीनामा भी फेमिनिस्टो के लिये एक जीत से कम नहीं है। विभूतिनारायण राव नें सबसे माफी माँगी है लेकिन बतौर लेखक कोई प्रतिज्ञा नहीं ली है कि वे इसका प्रयोग ही नहीं करेंगे। गाली भी लेखकीय अधिकार के दायरे में आता है चाहे वो किसी भी हद को छूता हो । कालिया जी का क्या है उनका तो काम ही है इस तरह का बवाल बनाना, यहीं उनकी सम्पादकीय सफलता है; उन्ही की क्या किसी भी सम्पादक की सफलता की कुंजी बवाल ही है। यदि उन्होंने तमाम हिन्दी मैगजीनो को इतनी शोहरत दिलाई है तो इस तरह के विमर्शो का ही उसमें योगदान है।  लेफ्ट क्या करता ऐंसे में सिवाय एक लोकताँत्रिक तरीके से इसको निपटाने के सो उनने किया। और जहाँ तक वृन्दा का सवाल है मैं समझता हूँ वे हिन्दी फेमिनिस्टों की गति को  समझती है इसलिये उन्होंने इसे तूल न देकर इसको माफीनामें से ही निपटा देनें मे सबकी भलाई समझा , कपिल सीबल नें भी इसकी अगम्भीरता को समझा और सब अच्छे से निपट गया।  लेफ्ट अब सीख गया हैं कि भारतीय जनतंत्र कीं गति में किस तरह चला जाय। जय हो लोक-तंत्र! 😉

–राजेश शुक्ला

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Responses

  1. आप अच्छा व्यंग्य लिखते हैं. इस तरह के मुद्दे जीत-हार के लिए नहीं लड़े जाते समाज के अँधेरे को उजाले में लाने के लिए लड़े जाते हैं, अपने अंदर के विवेक को जगाने के लिए लड़े जाते हैं. मुझे खुशी है कि आप यह तो मान ही रहे हैं कि वीएन राय ने गलत कहा है.

    • मैने कब कहा कि वे सही है। मैने तो पहले पोस्ट मे भी उसकी भर्त्सना की थी।

  2. भर्त्सना तो की ही जानी चाहिये लेकिन यह कोई बहुत बडा मुद्दा नही था इसे लेखकीय बहिष्कार से भी निपटाया जा सकता था।

  3. हाहा यही होना था। यह वर्गीय लिटरेरी पालिटिक्स है जिसमें यह कोई बडी बात नही है। सब देख कर होता है। लेकिन आपका भी डिफिनिशन सही है और पूर्वांचल में तो होली मे इस शब्द को समाज मे सभी सुनना चाहते हैं यह गाली न गाया जाय तो अशुभ माना जाता है। वैसे औरतो को भी शादी मे गाली के गीत गाने की छूट है किसी भी अति तक। वो तो सारा भडास निकाल लेती हैं और पुरूषो को भागना पडता है।

  4. सही फरमाया जी, हिन्दी मे सब कुछ साहित्य के अन्तर्गत आता है। जो कुछ भी हिन्दी जैसा है वह साहित्य है। होरी के गीत और गालियाँ भी लोक साहित्य का हिस्सा है।


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