Posted by: Rajesh Shukla | July 27, 2010

मुक्तिबोध की एक छवि


औ अकस्मात, जबरन,धक्के से
शिलाद्वार
वह गुहाद्वार आत्मा का धड से
खुलता है
औ अन्तर के उस गुहा-तिमिर में

[…]

लाल-वलय-शाली
अंगार-ज्योति के नीचे
पीडा की पुस्तक के
पन्ने स्वयं पलट जाते
कालान्तर अनुभव ग्रन्थ
देश देशान्तर के,
जो पढता हुआ जातवेदस् उद्दण्ड
क्रान्तिदर्शी कोई
बैठा है आजानुबाहु

…….

– मुक्तिबोध (मेरे सहचर मित्र का एक हिस्सा)

[मैं इसको पोस्ट कर रहा हूँ क्योकि ऐसी अद्भूत छवि तो कलाकार भी नहीं सोच पाते और बना पाते । कितनी अद्भूत छवि हैं आत्मा की जो एक उद्दण्ड क्रान्तिदर्शी है, जातवेदस् है ]

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