Posted by: Rajesh Shukla | July 27, 2010

पुराना रिश्ता-जे स्वामिनाथन



A work by J-Swaminathan, water color ink on paper

पुराना रिश्ता

परबत की धार पर बाँहे फैलाये खडा है
जैसे एक दिन
बादलों के साथ आकाश में उड जायेगा जंगल
कहते हैं पहले कभी
कोकू नाले तक उतरे थे देवदार
और आसमान को ले आये थे इतने पास
कि रात को तारे जुगुनू से
गाँव में बिचरते थे
अब तो बस
जब मक्की तैय्यार होती है
तब एक ससुरा रीछ
पार से उतरता है
छपेमार की तरह बरबादी मचाता है
अजी क्या तमंचे, क्या दुनाली बन्दूक
सभी फेल हो गये महाराज
बस, अपने ठंग का एक ही, बूढा खुर्राट
न जाने कहाँ रह गया इस साल

–जे स्वामीनाथन

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