Posted by: Rajesh Shukla | July 17, 2010

रामकुमार के साथ एक साक्षात्कार



[ Interview was taken for the Hindi newspaper Bhaskar. Today (17.7.2010 Saturday )after one month it has appeared in an another form called presentation. I do not know what is it (though it presents every passage of the interview but passages looks disconnected which is really not good ) but I am putting here the same interview so you can read it properly.]

१- आप नव्वे वर्ष पूरे करने वाले हैं। कला यात्रा के कमोवेश साठ वर्ष बाद आप कला की मूल प्रस्थापनाओं में कितना बदलाव देखते हैं।

रामकुमार-कला में तो परिवर्तन होते ही रहते हैं। देशकाल तथा परिस्थितियों में बदलाव के साथ कला भी बदलती है, उसके सरोकार भी बदलते हैं। लेकिन कला की जो मूल प्रस्थापनाये हैं वो नहीं बदलती वे कमोवेश सनातन हैं। कला के बजारीकरण ने भी कला में बहुत परिवर्तन किया है कई बार कला का निर्धारण उनके ही मानदण्डों से होने लगता है। कला पर बहुत गहरा प्रभाव पश्चिम के चिंतन का भी पडता रहा है लेकिन इन सबके बावजूद कला अपनें मूलभूत नियमों को नहीं बदलती है।

२-स्वतंत्रता के बाद आप फ्रांस चले गये और कमोवेश दश वर्ष बाद लौटे। आपने फ्राँस में आधुनिकता के चरम को देखा और अनुभव किया, उस आधुनिकता के विमर्श का भारतीय कला से किस तरह का सम्बन्ध बना ?

रामकुमार- फ्राँस की तुलना हिन्दुस्तान से नहीं की जा सकती थी कोई सम्बन्ध भी नहीं बनाया जा सकता था। उनके आधुनिकता के विमर्श के समक्ष हम कहीं भी नहीं थे। उस समय फ्राँस विश्व कला का केन्द्र था। हम सिर्फ वहाँ जाकर सीख सकते थे, देख सकते थे, हम उनसे विमर्श के स्तर पर नहीं जुड सकते थे। हमारे लिये वहाँ किये गये अनुभव हीं बहुत बडी बात रही। मेरा वहाँ के लेखको तथा कवियों से जो सम्बन्ध बना वह मेरे लिये ज्यादा महत्वपूर्ण रहा बनिस्बत कलाकारो के। कलाकारों से सम्बन्ध बनाना आसान नहीं था, पिकासो से हेलो कहकर भी हम क्या कर सकते थे। तो हमारी पीढी के कलाकार ज्यादा सीखने तथा देखने पर जोर देते थे। हम म्यूजियमों तथा कलादीर्घाओं के चक्कर काटते, जो सम्भव हो सकता था उसे आत्मसात करते। इसी से हम अपना कुछ कर सकते थे जो आसान कत्तई नहीं रहा।

२-आप किस तरह का अन्तर्सम्बन्ध अपनी कहानियों और पेन्टिंग के बीच देखते हैं?

रामकुमार- मैंने इन दो विधाओं को हमेशा अलग अलग माना। मैं इनके बींच कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाया। कहानियाँ लिखते समय मुझे पेंन्टिंग छोडना हीं पडता है। भाषा को लेकर भी मै कुछ विशेष नहीं कर पाया। मेरी कहानियों की भाषा बडी सरल तथा मध्यमवर्गीय है। मेरी पेन्टिंग भी कुछ उसीं तरह की एक सहजता समेटे हुये है।

३- जब आपने फिगरेटिव छोडकर भूदृष्य बनाने शुरू किये जो धीरे धीरे कमोवेश अमूर्त से होते गये तब आपका सरोकार कलाभाषा को लेकर किस तरह का था‍ ?

रामकुमार-यह कलाभाषा का ही सरोकार था कि मैं छवियों का त्याग कर रंगों और अमूर्त रूपाकारों की तरफ बढता गया, इसका विजन हीं कुछ अलग था । इसे कहीं न कहीं एक उन्मुक्त गतिमयता की माँग की पूर्ती के रूप में भी देखा जा सकता है। लेकिन यदि आप ध्यान दें तो छवियाँ बार बार कहीं न कहीं लौटती रहीं हैं जैसे मेरे बनारस कें भूदृष्य को हीं लें। मेरें भूदृष्य अमूर्त होकर भी अमूर्त नहीं है उनमें आकृतियाँ खोजी जा सकती हैं, पैचेज एक एक टेरीटोरी के रूप में अन्तर्गुन्थित हैं जो बृहत्तर फार्म को बुनती है उनकें बीच जो कुछ भीं आता है मुझे उनसे कोई ऐतराज नहीं रहता जहाँ तक वे मेरें दृष्टिविस्तार को बाधित नहीं करतीं-कैनवस कें संरचना के स्तर पर भी। यदि कहें तो मनुष्य अनुपस्थित होकर उसमें हर कही उपस्थित है। दृष्यभाषा के बतौर थोडा नकार के साथ मैंने अपनी यात्रा की है हलाँकि कि कई बार पूरे निगेशन कें लिये भी मचलता रहा हूँ जिसे आप मेरें रंगों निगेशन में अनुभव कर सकते हैं।

४-आप कहतें हैं कि प्रारम्भ में नवयुवक कलाकार अन्तर्वस्तु और विचारों से प्रभावित रहता है लेकिन ज्यों ज्यों वह परिपक्व होता है वह पेन्टिंग की भाषा की तरफ मुडता है-तो क्या यह भाषा भी स्वयं ही एक अन्तर्वस्तु नहीं है?

रामकुमार-मेरे कहने का तात्पर्य वैचारिक से है जिसे कलाकार अपनी अन्तर्वस्तु के रूप में प्रस्तुत करता है जो उसका नहीं होता। कला की भाषा ही उसकी वास्तविक अन्तर्वस्तु है इस बात को वह बाद में अनुभव कर पाता है।

५-जीवन के इस मुकाम पर अब कला के बारे में क्या सोचते हैं ?

रामकुमार- अब इसके इतर सोचने को क्या बचा है। अभी भी यही सोचता रहता हूँ कि कुछ नया क्या कर सकूँ । पेन्टिंग के रहस्य को जानने की अभिलाषा अब और भी उत्कट है।

{भारतीय समकालीन कला के एक स्तम्भ के रूप में पहचान रखने वाले रामकुमार का अपना एक अलग ही कलाविमर्श रहा है। अपने भूदृष्यों के साथ जिस तरह का साक्षात्कार व एकत्व वे स्थापित करते हैं उसमें आत्म-विगलन ही परम परामर्श है। आधुनिकता कें कला मानदण्डों तथा कलाकार के रचनात्मक मूल्यों का साक्षात्कार हम रामकुमार में कर सकते हैं — राजेश शुक्ला)

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