Posted by: Rajesh Shukla | July 2, 2010

पूँजीवादी व्यक्तिता की पशुता


चिन्तन करने वाले बुद्दिजीवीयों, और कलाकारों को शायद ही कभी उस हिटलरी ऐतिहासिक समय में न होने का दुःख होता हो, उसमें हिस्सेदार होने का, मानो वे थे ही नहीं- सिवाय एक दर्शक के। बहुत सारे अन्य ऐसे में विरक्ति का अनुभव करते हैं। किर्कगार्ड ने अपने दार्शनिक लेखों का आधार ही इसे बनाया- इसे उन्होने सौन्दर्यशास्त्र का क्षेत्र कहा। दार्शनिक व्यक्तिवाद के आलोचक यह ठीक ही तर्क देते हैं कि ‘तात्कालिक’ के सन्दर्भ में यह व्यवहार तथा आस्तित्व के प्रति उनकी उत्तरदायीत्वहीनता का अपना एक वस्तुगत-सत्य का क्षण है जो उसे ‘आत्मसंरक्षण का मोह’ के छोटे मोटे मन्तव्यों से परे ले जाता है (सीधे आशविज में।) ‘ इससे क्या फर्क पडता है?’ में (जो सत्य-भाव है), वह वास्तव में बुर्जुआ शालीनता और उसकी व्यक्तिता से अभिन्न है। यह एक पंक्ति ऐसी है जिससे वह अन्यों के अपेक्षाकृत थोडा निर्भय होकर सबसे पहले आस्तित्व के खोखलेपन के प्रति सचेत होता है। चूँकि यह विषयी आस्तित्व के खोखलेपन के प्रति सबसे जल्दी सचेत होता है इसलिये यह इससे परे जाने की कोशिस भी करता है। कैसे? दर्शक बनकर!! यह बुर्जुआ जो चीजो से उपर उठ जाता है वह स्वयं से ही उपर नहीं उठ पाता। इस विषयीगत बुर्जुआ चेतना में जो अमानवीय है, वह वास्तव में स्वयं को वस्तुओं और परिस्थितियों से ऊपर रख सकने की योग्यता है। यही अन्त में संक्षिप्ततः वास्तविक अर्थों में मानवीय है- जिसकी रक्षा में बुर्जुआ विचारक इतनी दृढता से अपनी दलीलें रखते हैं। (मार्क्स की आर्थिक पाण्डुलिपियों में बुर्जुआ सब्जेक्ट का गहरा विवेचन मिलता है) इससे पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता कि इसका यह अंश ही जो इस तरह व्यवह्रत है, आमरणशील है। वह सीन याद करिये जिसमे जार्ज बर्नार्ड शाँ थियेटर के रास्ते में अपनी पहचानपत्र को भिखारी के सामने रखते हैं और जल्दीबाजी में ‘प्रेस’ कह कर निकल जाते हैं, उस समय वे झुझलाहट में कुछ इस तरह के ही अपराधबोध को छिपाने का प्रयास करते हैं।

इससे हमें इस तथ्य पर प्रकाश डालने मे मदद मिल सकती है, जिसने शोपेनहाँर को विस्मित कर दिया था-” कि क्यों, मरे हुये व्यक्ति के दर्शन के बाद की भावना न केवल गैरों के सन्दर्भ में बल्कि अपनों के भी, अनेकानेक बार बहुत कमजोर होती है “। कुछ इसी तरह मानव बिना किसी अपवाद के एक गम्भीर पतनशीलता का शिकार है, कोई प्रेम के योग्य नहीं है और इस कारण हरएक व्यक्ति पर्याप्त प्रेम न पाने का अनुभव करता है। लेकिन दर्शक बने रहने का बुर्जुआ व्यवहार इस संन्देह को भी अभिव्यक्त करता है कि क्या इसमें इतना ही है? (अर्थात् क्या जो अमानवीयता दिख रही है वह इतनी ही है!! ), जबकि इसके बाद भी अपने व्यामोह (आत्मसंरक्षण का व्यामोह जो इस पूँजीवादी मानुष के लिये सबसे प्रासंगिक है) में फंसे मानव के पास गरीबी और क्षणिकता के इतर कुछ भी नहीं है- जो निश्चय ही अपने आवेग में पशुता है। इस पतनशील परिस्थिती (पूँजीवाद निर्मित वह वस्तुगत परिस्थिति जिससे व्यक्ति मुश्किल से ही मुक्त हो पाता है) के अन्तर्गत मानव के पास सिर्फ दो ही विकल्प हैं– तात्कालिक सांस्कृतिक मादकता -जो एक तरह की सौन्दर्यशास्त्रीय कमजोरी है(जैसा की यह संस्कृति उद्योग उपलब्ध कराता है) और सम्मिलित वर्गीय पशुता के ठाँचे में घुलमिल जाना (आत्मसंरक्षण के मोह के केन्द्र पर घूमती व्यक्तिता और उसकी विकास की अवधारणायें, जिसकी नैतिकता ‘क्या यही सबसे महत्वपूर्ण नहीं है’ से परिभाषित होती है) । दोनों ही मिथ्या जीवन है।

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