Posted by: Rajesh Shukla | June 19, 2010

मिथकों की दिव्यता


यह सच है कि कला ही मिथको का निर्माण करती है, वह कला जो जनता की चेतना से गहरे जुडी होती है। धार्मिक कलायें तथा साहित्य की एक बडी उपलब्धि यह रही है कि उनका विकास जनता से जुड कर होता रहा है- वे जनता से गहरे जुडी रही हैं। मिथक एक दिन में नही बन जाते उसके लिये किसी छवि की या किसी अवधारणा की अनन्त काल तक पुनरावृत्ति का होना जरूरी है। और यह सच है कि जो चीज सबसे परिष्कृत, सबसे उद्दात्त होती है मानव उसकी ही पुनरावृत्ति करता है चाहे वे मानवीय मूल्य हो, अवधारणाये हों या छवियाँ। मनुष्य झूठ की पुनरावृ्त्ति नहीं करता या उसका जिनमें भविष्य को जन्म देने की शक्ति न हो। यदि राम का मिथक सारी सीमाओं के पार जाता है तो वह उनके आदर्श हैं । राम के मिथक मे अनुस्यूत मूल्य समाज तथा परिवार के लिये आज भी उतने ही पवित्र और महत्वपूर्ण हैं। कृष्ण का मिथक भारतीय समाज में वह स्थान नहीं ग्रहण कर पाता जबकि यह वेदव्यास की एक बडी दार्शनिक उडान है। कृष्ण अब तक की सबसे उद्दात्त मिथकीय रचना हैं लेकिन उनमें वह आदर्श नहीं है जो राम के चरित्र में है। कृष्ण एक दार्शनिक जैसे हैं एक परिवारिक व्यक्ति नहीं है, उनका सब कुछ दैवीय है। दार्शनिको को कितने लोग समझ पाते हैं? भारतीय समाज भी नहीं समझ पाया। राम मानवीय-दैवीय हैं-कृष्ण खालिस दैवीय, राम मानवीय सुख- दुख को जीते है, कृष्ण एक स्थितिप्रज्ञ की तरह वर्ताव करते हैं। राम का लक्ष्मण के लिये रूदन मानवीय प्रेम की एक उद्दात्त अभिव्यक्ति है, कृष्ण को हम ऐसी परिस्थितियों में इन सबसे उपर उठे हुये वेदान्ती की तरह व्यवहार करते हुये देखते हैं-उनके लिये सब कुछ एक लीला है। राम सब कुछ जानते हुये भी अपने मानवीय भाव का अतिक्रमण नहीं करते, हाँ यदा कदा आवश्यकता पडने पर अपने ईश्वरत्व को इंगित से अनुभव भर करा देते हैं लेकिन दूसरे ही पल वें अपने उसी भाव को यथावत ग्रहण कर लेते हैं। कृष्ण की लीलाये दैवी है जबकि राम की लीलाये लौकिक हैं। कृष्ण भारतीय समाज में वह स्थान कभी नहीं बना सकें जो राम ने बनाया ।

वैसे भी मनुष्य बहुत सारी स्त्रीयों के साथ प्रेम करने वाले को सामाजिकतः कहाँ स्वीकार करता है!! यह बात बहुत गहरे एक बडे सत्य की तरफ ईशारा करती है कि वास्तव में राम का एक पत्नी व्रत का आदर्श हीं परिवार की रचना कर सकता है, बहुत सी स्त्रीयो के प्रेम में पडा व्यक्ति परिवार की रचना नहीं कर सकता। वह न तो एक आदर्श पति हो सकता, न ही एक आदर्श पिता। यह बात भगवान की शक्ति के दायरे में तो स्वीकार की जा सकती लेकिन मानव की शक्ति के दायरे में नहीं। शायद इसीलिये हर कहीं राम का होना, हर कोने में उनके पावन चरण चिन्हों का पहूँचना हमें चौंकाता है। क्यों कर हर कोई राम को अपने यहाँ देखना चाहता है? मैं हिमाचल के दूरवर्तीं क्षेत्रों में गया और कई जगह मैने देखा कि अरे राम तो यहाँ भी आये हैं, सीता की रसोई यहाँ भी है। राम देश कें उन सूदूरवर्ती क्षेत्रो मे सपरिवार पहूँच जाते हैं जहाँ आज भी पहूँचना आसान नहीं है। राम के मूल्य ही ऐसे हैं। दूसरी तरफ कला का यह विस्तार आश्चर्यजनक है। कला में यह शक्ति वास्तव में जनता की चेतना से जुडने पर ही आती है। बाल्मिकी या तुलसीदास यदि मिथको को यह दिव्यता प्रदान कर पाये तो यह उनका समाज से गहरा जुडाव तथा कला की गहरी समझ कारण सम्भव हो सका। मनुष्य उच्चतम मूल्यों को किसी न किसी रूप मे पूजता ही है। मिथक मानव के उच्चतम मूल्यो कें साकार रूप हैं।

जो कुछ भी मानव की सोच तक पहूँचता है वह छवियों से ज्यादा कुछ नहीं होता शायद इसीलिये मिथको को एक ऐसी छवि के रूप में सोचा गया होगा जो छवि होकर भी एक जीवन्त रूप हो जिसमें मानव का पूरा पूरा दर्शन समाहित हो सके। मिथक ऐसी छवियाँ है जो मानव कें साथ उसके जीवन में रच बस कर अपनी जीवन यात्रा पूरी करते हैं। जब ऐदोर्नो ने लिखा कि मिथ इज आल रेडी ऐन्लाईटेन्मेन्ट तो सम्भवतः वे कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे। मेरा मानना है की मानव की प्रज्ञा कें एक वाहक के रूप में मिथको को देखा जाना चाहिये। भारतीय मिथको के बारे में यह बात ज्यादा सही है।

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Categories

%d bloggers like this: