Posted by: Rajesh Shukla | June 16, 2010

यूरो-अमेरीकी ट्रेन्ड में खपता कलाविमर्श


Jannis Kounellis Untitled 1971

[ Published in Dainik Bhaskar on Saturday 3rd July 2010 with the same title. Posting it here as it is, though few lines were edited because of the space in the newspaper. enjoy.]
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हर साल यूरोप तथा अमेरिका में कला मेला का आयोजन होता है। इस साल भी आर्ट बासेल मियामी बीच पर हो रहा जिसमें तीन सौ ज्यादा कलागैलरियाँ भाग लेंगी। यह दुनिया का सबसे बडा कला मेला माना जाता है। इन मेलों की तर्ज पर भारत की कलागैलरियों ने भी इसे शुरू किया जिसके दो संकरण पूरे हो चुकें है जिसमें मंदी के समय में हुई आर्टसमिट नें लोगों को काफी आकर्षित किया था। इसकें दो फायदे हैं कला को जनता चाहिये तो उन्हे जनता मिलती है तथा यह एक अच्छा व्यापार का प्लेटफार्म भी है लेकिन इसके इतर क्या है? विदेशी कला मेला एक अलग हीं तमाशे के साथ होते हैं जिसमे किसी कला ट्रेन्ड के उभरने की आशा की जाती है, गैलरियों से जुडे क्यूरेटर तथा कला को सराहने वाले परिचर्चाये करते हैं तथा कोशिस करते हैं कि किसी एक विचार पर सब सहमति हो जिससे एक समीकरण बनाया जा सके और कोई ट्रेन्ड उभारा जा सकें। कला ट्रेन्ड पर सवार हो हर मुश्किल पार कर लेती है इसमें सब कुछ खप जाता है। यूरो-अमेरिकन कला विचार सर्वव्यापी हैं, वह यहाँ भी लागू होते हैं क्योंकि हमारे पास कोई कला का विमर्श नही है। पिकासो और उनकी इजाद की हुई कलाभाषा क्यूबिज्म ने सर्वब्यापी दैत्य की तरह हैं हमारे कलाकारों की आत्मा का लम्बे समय तक भक्षण किया। उसकें बाद कला के अन्य दौर आये जिनसे कलाकार गहरे प्रभावित होते रहें, आधुनिकता से लेकर उत्तरआधुनिकता तक केवल प्रभावित होने का ही इतिहास है, सच्चे मायनो में यह रचनात्मकता का इतिहास नहीं है। यदि सच में कला का इतिहास लिखा जाय तो बात यही सामने निकल कर आती है। मुझे यह लगता है कि कला मेले पर ध्यान देने की अपेक्षा कलागैलरियों को इस विषय पर ज्यादा ध्यान देना चाहिये क्योंकि बगैर इसके कला अंधी और बहरी ही रहेगी।

यदि पाश्चात्य कलाविमर्शो का पिछलग्गू बन कर ही चलना है तो बात अलग है। कला का अधिक से अधिक व्यापार किस तरह हो, किस तरह इस गति को तेज किया जाय इस विषय पर मन्थन करना तो ठीक है लेकिन कला विमर्श के बगैर इस मन्थन का कोई खास फायदा नहीं है। मियामी बीच पर हर साल होने वाले आर्ट बासेल का अपना एक विमर्श है, वे अमेरीकी-यूरोपीय ग्लोबल अर्थव्यवस्था के साथ अपनें कला विमर्श को जोड पाते है। पूँजीवादी समाज में कलाउत्पादन का यह सच है कि वह पूँजीवाद के विकास की दिशा में उसकी माँग की पूर्ति करता हुआ विकसित होता है। यहाँ विकास का बहुत कलाकार के स्व से लेना देना नहीं है, इस व्यवस्था में एक कलाकार यदि अमूर्तकला बनाता रहा है तो दूसरे पल उसे, शिल्प बनाना पड सकता है, वह बाध्य हो सकता है। वह शिल्प बनाने की लम्बी प्रक्रिया को जाने या न जाने, बाजार की माँग है इसलिये उसे जुगाड से भी बनाना पडे तो बनायेगा। समकालीन कला में यह जुगाड शब्द बडा दुःखी करता है। वस्तुतः यह कला की शिक्षा के अधूरेपन के कारण है कि कलाकार जुगाडू हो जाता है, बहुत कम ऐसे कलाकार हैं जिन्हे ड्राईंग आती है, यह मेरा जाँचा परखा सच है। कलाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयो में कलाकार दूसरे ही साल अमूर्त टाईप का कुछ घिसने लगता है, जल्दी-जल्दी किस तरह कला बाजार का हिस्सा बन जायें, यह हर कलाकार विद्यार्थी का उद्देश्य हो जाता है। भारतीय समकालीन कला में कई कलाकार जिन्होंने शिल्प विधा को कभी देखा और जाना नही, जब तीन साल पहले शिल्पों की माँग बढी तो उन्होने शिल्प भी बनाने शुरू कर दिये। आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि अमूर्तचित्र बनाने वाला अकस्मात् फिगरेटिव भी बनाने लगा जबकि उसे ड्राईंग आती तक नही है—यह सब बाजार की माया थी। उनका नाम था तो उनके ही शिल्प गैलरियों मे दिखाई पडते थे, जो शिल्पकार वास्तव में शिल्प बनाने वाले थे उनके शिल्पों का तो अता पता भी नहीं चलता था। पूँजीवादी आर्थिक प्रक्रिया किस तरह कला उत्पादन को प्रभावित करती है इसका यह एक अच्छा उदाहरण है।

सवाल इसका है कि क्या कला के भीतर इसकी आलोचना की कोई जगह बनती है? कलाकार इस विकास की प्रक्रिया में सिवाय एक उत्पादक के और क्या रह जाता है? कलाकार की एक समाजिक आलोचक की जो भूमिका है यदि कोई कलाकार उसको निभाने का कर्मकाण्ड करता है यानि जब बहुत ज्यादा समकलीन बनने की कोशिस करता है तो भी उसकी भंगिमा आलोचनात्मक न होकर सुझावात्मक ही होती है। वह पूँजीवाद के विकास में कुछ भी अशुभ नहीं देख पाता बल्कि उसे हर तरह से वैध बनाने की कोशिस करता है। उनकी चेतना को कुन्द बनानें मे बडा हाथ मल्टीनेशनल कारपोरेशन्स तथा तमाम ऐसे पूँजीवादी संस्थानो का भी है। वह कलाकार जो उनके प्रोजेक्ट पर ही काम कर रहा हो उससे उसकी आलोचना की अपेक्षा कैसी की जा सकती है? कला एक स्वतंत्र रचनात्मक कर्म ऐसे में कहाँ रह जाती है? यह सवाल पश्चिम में भी जोर शोर से उठ खडा हुआ है। आर्ट बासेल जैसे कला मेलों का ऐसे में कोई औचित्य नहीं रह जाता सिवाय इसकें कि यह नयी गैलरियो के लिये कला-व्यापार का एक प्लेटफार्म है। वैसे भी जब विदेशी कला संसार भारतीय कला को किसी भी दृष्टि से सम्मान नहीं देता तो आर्ट बेसल में क्या सम्मान देंगा, हाँ आप स्टाल की कीमत चुका कर अपनी दुकान लगा सकते है लेकिन आप अपनी उपस्थिति तो तभी दर्ज करा सकते हैं- जब कला होगी? वे तो अपने कलाकारों की लिस्ट में भी शायद ही हमारे कलाकारों को जगह देते है। वे अपनें कला पारखियों, कला आलोचकों, दार्शनिको के साथ आर्ट बेसल कें पैवेलियन में बैठकर अपने कला आंदोलन तथा कलाकारों पर चर्चा करते हैं, हमारी वहाँ जगह ही कहाँ होती है। इसलिये हमारा मानना है कि हमें अपने कला भाषा तथा कला के संस्कारों का परिष्कार करने की सख्त जरूरत है, कला में अपने कला विमर्श के साथ कुछ नया करने की जरूरत है। एक यहूदी लेखक का यह कहना समीचीन ही है कि भाषा बुद्दि और इल्हाम की माँ है-आदि और अन्त है।

–राजेश शुक्ला

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Responses

  1. hi, nice article on art. its true we need our own thinking and theories hitherto everything is just mad following, its slavery nothing else.

  2. dear sir thanks for writing it.
    this article is an eye opening, true, without one’s own discourse one can not stand infront of Euro-American art and culture. Art sale is another thing and creation another thing but unfortunately they have mixed it.


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