Posted by: Rajesh Shukla | June 5, 2010

Chintan’s ‘Nature God’



This Article was published in the largest circulated Hindi newspaper Danik Bhaskar on Saturday- 5 June 2010 with a minor edit. Posting for you to read the article as it is.

एक नये ठंग की दृष्य भाषा
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ताईपेई में साक्षी गैलरी द्वारा कीं जा रही चिन्तन उपाध्याय की “नेचर गाँड” नाम से हो रही कला प्रदर्शनी से समकालीन कला के लोगों उत्साहित हैं। चिन्तन कीं कला का समकालीन आधुनिक कला में एक अलग ही स्थान है।

चिन्तन का “नेचर गाँड” बेबी डाल्स हैं जो सदैव भविष्य की तरफ देखते है, जो सदैव सपनों की उडान उडतें है। वह इन्हें सुपर बेबीज कहते हैं , भविष्य की नइ छवियाँ ! अलग अलग रूप और आकार के ये खिलौनो जैसे दिखने वाले बेबी डाल्स ऐसी कलाकृतियाँ जो सब कुछ कहती है, एक पूरा का पूरा विमर्श लिये हुये हैं। चिन्तन इन पर लम्बे समय से काम कर रहें, ये लागातार विकसित होते रूपाकार हैं। उन्होने एक नये ठंग की दृष्य भाषा को इजाद किया है, एक नई आइकोनोग्राफी जों हमारी दृष्यभाषा से जुडती है, जिसे हम हम अपना कह सकते हैं। इन कलाकृतियों की भंगिमाये मानवीय हैं जिनके साथ उनके पूरे शरीर पर मिनियेचर शैली में चित्रित मानवीय कथायें मिलकर एक पूरा का इतिहास बनाती हैं।

इन बेबी डाल्स कीं भंगिमायें देखते हीं बनतीं हैं, नाचते हुये, आकाश में प्रक्षेपास्त्र की तरह उडते हुये, खडें होकर हमसें आखे चार करते हुये, हम पर व्यंग करते हुये, ठहाके लगाते हुये, तो कभी मायूस और चिंतित, वे गैलरी में एक अद्भूत नजारा पेश करते है। उनकी भंगिमाऐ एक बहुत क्रियाशील छवि प्रस्तुत करती है मानों वे चेतना की समकालीन गतिमयता को दर्शाती हों। उनकें यें बेबीं डाल्स स्कल्पचर भी हैं और फिर पेन्टिंग भी दोनों के तत्व इनमें समाहित हैं। आधुनिक समकालीन कला में एक प्रमुख स्थान रखने वाले चिन्तन ने कमोवेश हर एक विधा में काम किया है। वे हरएक देश में अपनी प्रदर्शनियाँ लगा चुके है। समकालीन कला के गिने चुने दस नामों में इनका नाम शुमार है। जो सबसे महत्वपूर्ण बात चिन्तन की कला के बावत है वह यह है कि वह कला को एक औद्योगिक स्वरूप देने की कोशिस करतें है।

उनके डिजायनर बेबी बहुत चर्चित हैं और हर कोई जो उसे खरीद सकता है वह इसे अपने घर में रखना चाहेगा। ये कलाकृतियाँ भविष्य की कला का एक दूसरा पहलू सामने रखती हैं। चिन्तन कला के उत्थान के लिये भी काम करते हैं जिसके लिये उन्होने ‘सन्दर्भ’ नाम की एक संस्था बनाई है जो दृ्ष्य कला की हर एक विधा में काम करने के लिये कलाकारों को प्रोत्साहित करती है। यह कलाकारों को दिशानिर्देश देती तथा उनके रहने की जगह भी मुहै्या कराती है। चिन्तन एक सेन्सिटिव कलाकार हैं तथा कला को एक वृहत्तर आयाम देने की सोचते हैं।

कला गैलरी के सीमित दायरे से निकलकर किस तरह समाज से जुडे, किस तरह कला लोगों के लिये रोजगार के अवसर प्रदान कर सकने में सहयोगी हो वे इसके लिये प्रयत्नशील है। देश में इस तरह के पहल की जरूरत है जैसा कभी इस शताब्दी के प्रारम्भ में जर्मनी, फ्राँस इत्यादि देशों ने लिया था जिससे उनके यहाँ कला का विकास अनेकानेक दिशाओं में हुआ जो उद्योगो के लिये भी बहुत महत्वपूर्ण था। पश्चिम में कला उद्योगोभिमुखी रही है, यह ऐसे नहीं है कि हीगेल जैसे विचारकों नें इसे औद्योगिक विकास कें केन्द्र में देखा था। लियोनार्दो-द-विन्ची केवल कलाकार ही नहीं थे, वे एक बडे डिजायनर भी थे जिन्होने उद्योग के विकास की उस अवस्था में जहाज इत्यादि की डिजाईन बनाने की कोशिस की थी और कई ऐसे प्रयोग किये थे।

कला सिर्फ पेन्टिंग और शिल्प ही नही होती और न ही केवल कुछ लोगों के लिये बनाई जाने वाली कोई कलावस्तु, इसका दायरा बहुत बडा है, यह सामान्य मानव के आर्थिक जीवन से बहुत गहरे जुडती है। जब तक आधुनिक कला नहीं थी तब कला को क्राफ्ट कहा जाता था जिसका स्वरूप कमोवेश औद्योगिक था जिसका एक उदाहरण जयपुर की मिनियेचर हस्तकला उद्योग है। यह वही कलाकार थे जिनकी बनाई कला विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम जैसे बडे म्यूजियम कीं शान बढाते हैं तथा जिनपर बडें बडें सौन्दर्यशास्त्र के पारखी चर्चा करते हैं। कला का एक औद्योगिक स्वरूप भी है जिसे हम चीन में द्रुत गति से विकसित होते हुये देख सकते हैं। चीन के कलाकार न केवल उच्च कोटि की कला बनाते हैं बल्कि कला के ऐसे विचारों और अवधारणाओ को भी जन्म देते हैं जिससे उनके फैशन और फर्निचर उद्योग जैसे अन्य उद्योगों को विकसित होनें में सहयोग मिलता है। चीन की अतिविकसित समकालीन कला का कायल आज पूरा यूरोप और अमेरिका है । चीन ने कला के दोनो स्तरों पर अर्थात् उच्च कला तथा औद्योगिक कला से पश्चिम के सामने एक नये तरह की चनौती रखी है। पश्चिम के देशों में भी बहुत सारे इस तरह के उद्योग नये विचारों और कन्सेप्ट्स के लियें कलाकारों की तरफ ही देखते हैं। इन उद्योगो को वास्तव में कला की जरूरत होती है, एक नये ऐस्थेटिक्स की जरूरत होती है। चिन्तन उपाध्याय भी कला के इस स्वरूप को सामने लाने की कोशिस करतें है।

–Rajesh shukla

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