Posted by: Rajesh Shukla | February 21, 2010

Vacharambhano Vikaro namdheyam !


तिरोकुडडुसुतं
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१- तिरोकुड्डेसु तिट्ठन्ति, सन्धिसिड्घाटकेसु च।
द्वाराबाहासु तिट्ठन्ति, आगन्तवान सकं घरं।

२- पहूते अन्नपानम्हि, खज्जभोजे उपट्ठिते।
न तेसं कोचि सरति, सत्तानं कम्मपच्चया।।

३- एवं ददन्ति ञातीनं, ये होन्ति अनुकम्पका।
सुचिं पणीतं कालेन, कप्पियं पान भोजनं।
इदं वो ञातीनं होतु सुखिता होन्तु ञातयो।।

४- ते च तत्थ समागत्वा, ञातिपेता समागता
पहूते अन्नपानम्हि सक्कच्चं अनुमोदरे।।

५- चिरं जीवन्तु नो ञाती, येसं हेतु मभामसे।
अम्हाकं च कता पूजा दायका च अनिफ्फला।।

६- न हि तत्थ कसी अत्थि, गोरक्खेत्थ न विज्जति।
वणिज्जा तादिसी नत्थि हिरञ्ञेन कायाक्कयं।।

१- जो प्रेत अपने पूर्व गृहों से आकर घरों की दीवारों के बाहर या दो घरों के मिलन स्थल पर या चौराहो पर आकर वैठे हुये हैं

२-वहाँ प्रभूत अन्न पान खाद्य भोज्य पदार्थ के उपस्थित रहने पर, अपने कर्मभोग के कारण, उन प्रेतों मे से कोई भी वहाँ से नहीं जाता।

३- ऐसे प्रेतो पर दया करने के लिये उनके जीवीत सम्बन्धी उन को उत्तम एवं रूचिकर भोजन से समय समय पर यह कहते हुये तृप्त करते हैं कि यह भोजन हमारे प्रेत ज्ञानियों की तृप्ति के लिये हो। इसको प्राप्त कर वे सुखानुभव करें।

४- वे ज्ञाति प्रेत वहाँ आकर उनका दिया हुआ उत्तम एवं प्रभूत रूचिकर भोजन प्राप्त कर उससे सन्तुष्ट होकर उस भोजन दान का अनुमोदन करते हैं-

५- ” हमारे ये सम्बन्धिजन चिरकाल तक जीवित रहें जिनकी कृपा से हमे यह प्रभूत रूचिकर भोजन मिल रहा है। दानदाता द्वारा की गई हमारी पूजा उसके लिये कभी निष्फल नहीं होगी।”

६- वहाँ प्रेत लोक में न कृषि है न दूध के लिये गौ, न धन अर्जन के लिये कोई व्यापार का साधन है, न सुवर्ण के माध्यम से किसी चीज क्रय या विक्रय है। वे प्रेत तो यहाँ के जीवित सम्बन्धियों द्वारा कृतदान से ही अपना जीवन यापन करते हैं।

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