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<यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम>

श्रीकृष्ण ने भगवदगीता में क्या कहा है “न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः” केवल मनुष्यों मे नीच,अधम,मूढ ही मुझ वासुदेव की पूजा न कर पीरसीर की पूजा करते है”। जिस धर्म और परम्परा की रक्षा के लिये द्वारका पीठ के शंकराचार्य श्री स्वरूपानन्द जी लड रहे है वह भगवान द्वारा स्थापित सनातन वैदिक परम्परा है! कृष्ण जी ने कहा था अर्जुन से “”एवं परम्परा प्राप्त मिमं” यह परमतत्व का ज्ञान जो मै दे रहा हूँ वह परम्परा से प्राप्त है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी ने सनातनधर्म की रक्षा करने का जो वचन पीठ पर बैठते समय लिया था उसे निष्ठा से निभा रहे है| जो कोई भी ईश्वरीय सनातन हिन्दू धर्म की परम्परा के खिलाफ खडा होगा वह हिन्दू विद्वेषी करार दिया जायेगा! Read More…

Posted by: Rajesh Shukla | June 27, 2014

What is Yantra?

Tantra as its root meaning indicates, is a means of spreading or propagating knowledge –knowledge both spiritual and that which is conducive to worldly happiness. It is a means to attain chaturvarga-the four objectives of knowledge. Tantras claim equal sanctity and importance as Vedas; even Agmas speak about their greatness.  Agama texts say that all the Arsha or Arya spiritual literature dwell in Maya and not fit for absolute knowledge. However Yantra-Mantra aspect of Vedic and Tantrik paths of spiritual practice comes to them from ancient ritualism found in pre-Vedic age.  Pre-Vedic form of Tantrik practice still persist in Damar and various other minor forms of Tantras in which howling, crying; anything can be a mantra. Ancient form of Yantra is found in the form of Vedic Yajna-vedi and Mandala, perhaps, various forms of Yantras that have become universal in Tantra tradition would have been evolved from it.

Yantra according Indian metaphysics is geometric representation of energies.  In Hindu Tantras, Mantra is said to be the rays of consciousness “Mantras chinmarichayah-Shiva Sutra” that Yantra represents figuratively. Indian seekers after truth believed that everything in this world represents the abstract energies of goddess, hence, every visual phenomena is a form of Yantra. Every visual form is a Yantra.   Read More…

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ विचारधारात्मक स्तर पर भले ही एक आदर्शवादी संगठन हो लेकिन अपनी राजनीति और संगठनात्मक विस्तार में यह किसी वामपंथी क्रन्तिकारी संगठन से काम नहीं रहा है । ऐसा भी नहीं है की संघ अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा की आदर्शवादिता का कोई बेहतर आदर्श सामने रखता हो। यह मूलभूत रूप से समझौतावादी और मौकापरस्त संगठन रहा है जिसकी पुष्टि इसका ८५ साल से अधिक पुराना इतिहास करता है। राजनीति में यह भौतिकवादियों की तरह यथार्थवादी और अन्य पार्टियों से ज्यादा व्यावहारिक रहा है। अपनी राजनैतिक गत्यात्मकता को संघ ने लगातार धारदार बनाया है, भौतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ठाला है और सदैव आगे ही बढ़ा है । यह सबको ज्ञात है कि जब तक नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक उन्होंने संघ को गुजरात में प्रभावी नहीं होने दिया बल्कि कितने ही संघ के दिग्गजों को किनारे लगाया। संघ से उनके सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं रहे है लेकिन स्थितियां शायद अब वैसी ही नहीं है । मोदी अंतराष्ट्रीय पूंजी  का दबाव में काम करने को बाध्य होंगे और दूसरी तरफ संघ की आर्थिक  पॉलिसी बदल जाने से यह टकराव  शायद अब न हो | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सत्ता लोलुपता अब बढ़ गयी है ! संघ ने समझौता किया है और उसी नरेन्द्र मोदी को आगे ले आया जिससे वह पीड़ित था, यह हमने विगत चुनाव में देखा ! नरेंद्र मोदी को अपना राष्ट्रीय नेता स्वीकार कर संघ ने वास्तव में अपनी आर्थिक विचारधारा के स्तर पर समझौता किया, संघ ने मोदी की उस आर्थिक विचारधारा को स्वीकार किया जो संघ की स्वदेशी अर्थव्यवस्था की विचारधारा से बहुत अलग है। Read More…

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देवगुरु वृहस्पति ने याज्ञवल्क्य से एक समय   पूछा ” सर्व प्रसिद्द कुरुक्षेत्र कहाँ है? वह क्षेत्र जहाँ देवता यजन करते हैं? क्षेत्र जो सभी प्राणियों के लिए ब्रह्म सदन हैं? ” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया ” हे गुरु ! अविमुक्त वह क्षेत्र है जहाँ देववर्ग यजन करता है, यही कुरुक्षेत्र है जहाँ मृत्यु काल में प्राणियों को रूद्र तारक मंत्र उपदेश करते हैं जिससे मुक्त होकर वह अमरत्व प्राप्त कर लेता है।” ज्ञातव्य है कि वाराणसी को भी पुराणो में अविमुक्त क्षेत्र कहा गया हैं। पुराणो में यह प्रसिद्ध है मृत्यु को प्राप्त जीवात्माओं को भगवान शिव इसी क्षेत्रमें तारक मंत्र का उपदेश देते हैं जिससे उनको उत्तम गति प्राप्त होती है। याज्ञवल्क्य उपदेश में स्पष्ट करते हैं कि अविमुक्त क्षेत्र अनंत और अव्यक्त आत्मा का सदन है। इसी क्षेत्र में प्राणियों को आत्मउद्धार के लिए उपासना करनी चाहिये। इस क्षेत्र की उपस्थिति समष्टि में काशी और व्यष्टि में मानव देह है। Read More…

Posted by: Rajesh Shukla | February 3, 2014

Reading the clean chit: no cleanchit to Modi

The 2002 Gujarat riots did not happen because Narendra Modi authorised the killing of Muslims that cold February. The longer we dwell on his direct role — for which evidence is thin — the longer his “clean chit” will be used to wipe out two other crimes. The first of those is the role BJP politicians, Sangh Parivar members and police officials played in the killing of more than a thousand Muslims early that year.

For this there is evidence. The other crime is the follow up. It is a scandal that the conviction rate in the riot cases pursued by the Modi state government is just 5 per cent. In contrast, in those trials where the Supreme Court outsourced investigation, prosecution and witness protection away from the Gujarat state government, I estimate the conviction rate to be 39 per cent. This is nearly eight times better than the Gujarat government. These are crimes no clean chit should erase. How then is it happening? Read More…

Posted by: Rajesh Shukla | December 17, 2013

A house in the heart of the multitude..

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Gustave Caillebotte – Paris Street; Rainy Day

The poet parallels the prostitute parallels the flâneur parallels the bohemian, all engaged in universal prostitution created by Consumerism.  Read More…

Posted by: Rajesh Shukla | July 12, 2014

This is assent…

He would raise his hand, spread out his fingers, and say: ‘This is [image].’ Then he would bend his fingers slightly and say: ‘This is assent.’ Then he would clinch his fist and say: ‘This is perception.’ Finally he would clasp his right fist to his left hand and say:”This is wisdom which belongs only to the sage.”–Zeno 

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