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भगवद्गीता के लिए उत्सव मनाने का औचित्य तो मुझे समझ में आता है लेकिन यह 5151 वर्ष पहले पैदा हुयी थी इसको लेकर मेरे भीतर एक उहापोह है ! उस काल-खंड का निर्णय करना बहुत कठिन है इसलिए बेहतर होता हम कयास न लगा कर सिर्फ उत्सव को मनाते और कुछ सार्थक बहस करते ।  इस समय देश को राजनीति नहीं सार्थक काम और सार्थक बहसों की जरुरत है । मसलन हम आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में भगवदगीता पर एक धर्म सभा बुलाते और उन विषयों पर चर्चा करते जिनसे देश बड़ी मुसीबत में है । उन पर चर्चा करते जिनसे भूमंडल के लोग परेशान हैं। हम ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा करते जिससे दुनिया का पर्यावरण खतरे में पड़ गया है । इस परिप्रेक्ष्य में भगवदगीता हमारा मार्ग प्रदर्शक हो सकती है। भगवदगीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है:

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ।।

यदि हम प्रकृति का दोहन करते हैं तो हमें प्रकृति को वापस भी तो करना चाहिए ! यह एक उच्च अध्यात्मिक भाव है जिसको हम नहीं समझ पा रहे हैं ! वैष्णव सिद्ध योगी देवरहा बाबा नें एक बार गंगा के जल से ही हवन करवा दिया था लेकिन जितना जल घी के रूप में प्रयोग हुआ उसे उन्होंने यजमान से मंगवाकर गंगा जल में डलवा दिया । लोगों नें पूछा “ऐसा क्यों कर रहे हो बाबा?” तो देवरहा बाबा नें कहा जिस प्रकृति से तुम लेते हो उसको वापस भी करना तुम्हारा फर्ज है, ऐसा न करने से पाप होता है ! यह एक भाव है जिसका संस्कार अध्यात्म से आता है ।

भारत दुराचार से जूझ रहा है, देश अब कब धर्म गुरु बनेगा पता नहीं लेकिन यह वेश्यावृत्ति में विश्व में चौथे स्थान पर है । साधू महात्माओं के इस देश नें यह स्थिति कैसे पैदा की है? देश में लाखों की संख्या में बाबा, साधु, योगी , प्रवचनकर्ता  धर्म का प्रचार करते हैं और धर्म गायब होता जा रहा है, यह क्या एक बड़ा आश्चर्य नहीं है ? क्या ये धार्मिक लोग ही अधर्म  की वृद्धि करने में संलग्न नहीं हैं –आशाराम से रामपाल तक जो सामने आया है वह धार्मिक अधर्मियों की पोल खोलता है ! haryana-Sant-Rampal-baba-arrest-police-Satlok-Ashram-High-Court-news-hindi-india-78501वास्तव में जुर्म, शोषण , रेप , कालाबाजारी, ब्लैक मनी , इत्यादि के गढ़ बन गए हैं धार्मिक संस्थान और धार्मिक समितियां ! कहाँ चूक हुयी है !! इस पर चर्चा ज्यादा महत्वपूर्ण है बनिस्बत इसके कि गीता के नाम पर हवन कर तमाम दिखावा करें। हिंदू समाज में ऐसा कभी नहीं रहा. वेश्यावृत्ति में विश्व में चौथे स्थान पर और बलात्कार में तीसरे नम्बर पर होना बहुत बड़ी चिंता का विषय है । गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस वस्तुस्थिति पर संसद में खेद जताते हुए कहा है “यह इस देश के लिए शर्म की बात है “! इस बावत भी भगवदगीता हमारा मार्ग प्रदर्शक हो सकती है और हमें सही रस्ते पर ले जा सकती है। भगवदगीता में कृष्ण नें कहा है : “धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ: – हे अर्जुन! मैं वहीँ वासनाएं और इच्छायें हूँ जो धर्म के अविरुद्ध अर्थात् वे जो धर्म की वृद्धि करती हैं और व्यक्ति को सत्य तक ले जाती हैं !” हम इस पर न  तो चलते हैं और न  ही इसको मानते हैं । यह भी वस्तुतः पर्यावरण का ही विषय है ! वह भारतीय जीवन कहाँ विलुप्त हो गया जिसमें अध्यात्मिक-अधिदैविक और अधिभौतिक इन तीन स्तरों पर पर्यावरण की संकल्पना की गई थी? क्या हमें अभिज्ञान शाकुंतलम का वह दृश्य याद है जिसमें  पूरा वन शकुन्तला का विरोध करता है !
भो भोः संनिहितास्तपोवनतरवः |
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या.
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम् ।
आद्ये वः प्रथमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः.
सेयम् याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञाप्यताम् ॥
पेड़ कहते हैं देखो ! देखो ! वही शकुन्तला अपने पति के घर जा रही है जिसने हमें जल दिए बगैर स्वयं कभी जल ग्रहण नहीं किया । चलो सभी मिलकर उसे न जाने के लिए कहें । फिर कण्व ऋषि शकुंतला को कहते हैं, “पुत्री उन दरख्तों से भी विदा लो जिनकी गोंद में तुम खेली हो और बड़ी हुयी हो। जाओ पुत्री, उनका जल से अभिसिंचन करो, वे तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं !” शकुन्तला लोटे में जल ले जाती है  उन पेड़ों को जल देती है और उनसे विदा लेती है !
अनुमत गमना शकुन्तला तरुभिरियम वनवास बंधुभिः !
प्रभृतविरुतम कलं यथा प्रतिवचनीकृतमेभिरीदृशं!!

शकुन्तला को जाने का इजाजत पेड़ों से मिलती है, वन में रहने वाले बंधुओं से, उन पशु पक्षियों से मिलती है जिनके बीच वह पली बढ़ी थी। कालिदास में वह सौन्दर्य दृष्टि कहाँ से आयी? यह हमारी जीवन दृष्टि रही है जिसको उन्होंने अपने काव्य में अभिव्यक्त किया है।

दिल्ली में गीता प्रेरणा उत्सव का आयोजन किया गया अच्छी बात है लेकिन प्रेरणाओं का जिक्र नहीं हुआ । इस मौके पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा पहले ही मिल गया है लेकिन इसे संसद में रखा जायेगा इसे राष्ट्र-ग्रन्थ घोषित करने की मांग की जायेगी । क्या हो जायेगा इससे? Untitledदेशभर में हजारों लोग प्रति दिन भगवदगीता पर ज्ञान यज्ञ करते हैं, हजारों सालों से ज्ञान यज्ञ हो रहा है लेकिन वह ज्ञान-यज्ञ देश से अन्धकार नहीं मिटा पा रहा है ! क्यों है ऐसा? क्या यज्ञ में त्रुटि है या यज्ञकर्ता में त्रुटि है ! “यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र”  क्या यज्ञ ज्ञान के लिए ही निष्काम भाव से किया जा रहा है? नहीं किया जा रहा है, यह एक कर्मकांड भर रह गया है ! आदि शंकराचार्य नें ज्ञानयज्ञ से बौद्ध धर्मानुयायियों द्वारा फैलाये गए अज्ञान को ख़त्म कर इस देश में पुनः धर्म की स्थापना किया लेकिन हम अक्षम हैं । इस संदर्भ में भी भगवद्गीता ही मार्गदर्शन कर सकती है ! कलियुग में गीता से प्रेरणा साधू भी नहीं लेना चाहते। धर्म के विरुद्ध काम करने वाले साधुओं की जमात धर्म के लिए काम करने वाले साधुओं से अधिक है ! इस देश में ही  रामपाल, आशाराम जैसे राक्षस धर्म के लिबास में  धर्म को ख़त्म करने पर तुले हुए हैं! यह सृष्टि सामंजस्य विरहित हो गयी है। मनुष्यता में कुछ गुणों की प्रबलता से जुर्म , वेश्यावृत्ति, भ्रष्टाचार इत्यादि में असीम वृद्धि हुयी है । गीता इन मुसीबतों का  समाधान में कुछ सहयोगी जरूर हो सकती है! हमें अपने पर्यावरण को इनके द्वारा ही दुरुस्त करना होगा ।

नान्यः पन्था विद्यतेSनाय !

2722155_origनेपाल सीमा पर बारा जिला कलैया बरियारपुर में स्थित गढ़ीमाई का प्राचीन मंदिर इन दिनों विश्व भर में चर्चा में है । विश्व प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक सिद्धपीठ को शक्ति , शौर्य , ऐश्वर्य और प्रसिद्धि की देवी माना जाता है । यहां पर देशी-विदेशी लाखों पर्यटक मनाये जाने वाले उत्सव् को देखने के लिए दूर दूर से आते हैं। लाखों लोग देवी गाढ़ीमाई के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपने भौतिक उत्थान की मन्नत मांगते हैं । देवी मंदिर के बाहर प्रांगड़ में हर पांच साल बाद पशु बलि का आयोजन किया जाता है । मंदिर के इस कंक्रीट से बने कत्लगाह में बलि की शुरुआत मंदिर के प्रधान पुजारी द्धारा की जाती है । मंदिर के प्रधान पुजारी को ” सप्तबली” नाम से पुकार जाता है। वास्तव में सप्तबली के अंतर्गत भैंसा के अतिरिक्त चूहा , कबूतर , मुर्गा , बत्तख और सुअर जैसे जीव आते है जिसको मंदिर का प्रमुख पुजारी देवी रूप में स्वीकार करता है।

पिछले बलि आयोजन के आंकड़ों के अनुसार 20,000 से अधिक भैसो की बलि पहले दिन ही दे दी गई थी, कुल बलि पशुओं की संख्या पांच लाख तक पहुंच गयी थी। गढ़ी माई के कत्लगाह में मन्दिर द्वारा नियुक्त २०० लोग बलि कर्म को अंजाम देते हैं । हर पांच साल बाद ३ लाख से ५ लाख तक पशुओं की बलि दी जाती है । gadhimaiयह बलि प्रमुख रूप से महिष की होती है (जिसे जल महिष कहा जाता है) लेकिन उसकी बलि के साथ साथ बकरी , मेष , सूअर , मुर्गा और कबूतर इत्यादि की भी बलि दी जाती है । बलि एक दिन नहीं पूरे महीनें भर चलता रहता है । पशुओं की बलि इस हद तक दी जाती है कि पिछले 2009 में हुए बलि आयोजन के दौरान न केवल पशुओं की कमी हो गई थी बल्कि भक्तों को उसके मांस की भी कमी हो गई थी । उस समय सरकार नें रेडियो से घोषणा करके किसानों को देवी की प्रसन्नता के लिए अपने पशुओ को बेचने के लिए कहा था ! इस कत्लगाह में इस दौरान की अफरातफरी और चीख पुकार दिल दहलाने वाला होता है, ऐसा लगता है मानो पूरा प्रांगण ही खून का तालाब बन गया हो । इस बलि का दृश्य बीभत्स होता है क्योकि बहुतेरे तो वहां खून पीते हुए भी दिखते हैं। इस वीभत्स दृश्य और इसका खौफ का अनुमान वहां उपस्थित बच्चों की आँखों में देख कर लगाया जा सकता है । बलि में काटे गए पशुओं को पड़ोस के गावों में ले जाया जाता है जहाँ सारे गांव के लोग उसे प्रसाद रूप में वितरित कर लेते हैं और अपने घर में पका कर खाते हैं। उनका मानना है कि यह प्रसाद अशुभ को ख़त्म कर उनके यहाँ शुभत्व ले आता है। इस बलि आयोजन के दौरान यह विश्व का सबसे बड़ा स्लॉटर हाउस बन जाता है ।

गौरतलब है कि देवी के मंदिर में इस दौरान आये श्रद्धालुओं में और बलि करनें वालों में ७०% उत्तर प्रदेश , बिहार और बंगाल से होते हैं क्योकि इन राज्यों में बलि प्रथा पर कमोवेश बैन है । इन लोगों में मूलभूत रूप से गांवों के किसान , श्रमिक , फैक्टरी में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या सबसे ज्यादा होती है । ये अज्ञानी लोग यह समझते हैं की मुर्गे की बलि मात्र से उनके सरे कष्ट मिट जायेंगे और देवी उन्हें ऐश्वर्य से भर देंगी ! पिछले बलि आयोजन के लिए नेपाल सरकार नें 36,000 पौंड आवंटित किया था जिसका पशु कल्याण और अंतर्राष्ट्रीय पशु अधिकार संस्थाओं ने जबरदस्त विरोध किया था । इस मास स्लॉटर का विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं में मेनका गांधी भी एक प्रमुख नाम है जिन्होंने नेपाल सरकार को पत्र लिख कर इस बलि को रोकने का अनुरोध किया था । नेपाल सरकार नें पशु अधिकार संस्थाओं के विरोध को नजरअंदाज करते हुए इस वीभत्स प्रथा को जारी रखा है । सरकार का कहना है कि यह उत्सव नेपाल के मधेशी लोगों का एक सबसे प्रमुख त्यौहार है इसलिए इसको रोकना कमोवेश असम्भव् है । नेपाल के पशु अधिकार कार्यकर्ता रामबहादुर बोम्जो को अब भी आशा है कि नेपाल के लोग इस वीभत्स कर्मकांड का विरोध करेंगे और इससे मुक्त होकर देवी की सात्विक भक्ति की तरफ जायेंगे । राम बहादुर को पशु बलि का विरोध करने और इस बावत जनजागृति लाने के कारण नेपाल में करुणा का अवतार तक कहा जाता है । लोगों का मानना है कि रामबहादुर का प्रयास एकदिन जरूर सफल होगा और यह दुर्दांत प्रथा नेपाल से ख़त्म हो जाएगी । उनके आंदोलन से अब सरकार भी जागृत होने लगी है, उनके कहने मात्र से अब सरकार पुलिस को उन स्थानों पर बलि रोकने के लिए भेजने लगी है जहाँ इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं ! भारत के उच्च न्यायालय नें भी इस दिशा में पशु अधिकार की अपील पर कुछ कदम उठाये हैं। पिछली बार ही सुप्रीम कोर्ट नें एक निर्देश जारी कर राज्य सरकारों को पशुओं की तस्करी रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के लिए कहा था । जिन राज्यों से गढ़ी माई के लिए पशु तस्करी किये जाते हैं उन राज्य सरकारों द्वारा इस पर ध्यान कम दिया जाता है जिसके कारण अब भी हजारों की संख्या में पशु सीमावर्ती इलाकों से ले जाये जाते हैं ।Gadhimai Ritual

हिन्दू धर्म में हिंसा का कोई स्थान नहीं है । वास्तव में यज्ञ में भी पशु हिंसा का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता. वैदिक कोष- निरुक्त २.७ यज्ञ को ‘अध्वर‘ कहता है अर्थात हिंसा से रहित (ध्वर=हिंसा)|पशु हिंसा ही क्या, यज्ञ में तो शरीर, मन, वाणी से भी की जाने वाली किसी हिंसा के लिए स्थान नहीं है|वेदों के अनेक मन्त्र यज्ञ के लिए अध्वर शब्द का प्रयोग करते हैं! यज्ञ में वैदिक मन्त्र ही पढ़े जाते थे और अग्नि में घी, दूध, दही, जौ, इत्यादि की ही आहुति दी जाती थी किसी अन्य अमिष तत्व की नहीं ! वास्तव में पशु याग का अर्थ पशु से नहीं बल्कि पाशविक चित्तवृत्तियों से है। देवता के समक्ष इन वृत्तियों की ही बलि दी जानी चाहिए, यही शास्त्र सम्मत है ! उपनिषदों के अनुसार –“कामक्रोधलोभादयः पशवः ” अर्थात काम, क्रोध और लोभ इत्यादि ही पशु हैं, इन्हीं का यज्ञ में हवन करंना चाहिए । शैवागम में भी पशु का तात्पर्य इन्ही मनोवृत्तियों से है। ऋग्वेद में तो पशु हत्या मात्र निषेध है : “माँ नो गोषु , माँ नो अश्वेषु रिरिषः-ऋग्वेद १ /११४/८ ” हमारी गायों और घोड़ो को मत मारो। सामवेद में भी यह एक एकदम स्पष्ट है ” न कि देवा इनिमसि न क्या योपयामसि । मन्त्र श्रुत्यं चरामसि ” अर्थात हे देव ! हम हिंसा नहीं करते और न ही ऐसा अनुष्ठान करते हैं, हम वेद मन्त्र के अनुसार आचरण करते हैं ” ! पद्मपुराण में तो देवी पार्वती स्वयं पशु बलि का विरोध करती हुई कहती हैं ” जो व्यक्ति मेरी पूजा के विचार से प्राणियों का वध करते हैं वह पूजा अपवित्र है। इस हिंसा से निश्चय ही उनकी अधोगति होती है। हे शिव तामसिक वृत्ति के लोग ही ऐसा दुष्कृत्य करते हैं। करोड़ों कल्प तक उनका नरक में वास होता है इसमें कोई संशय नहीं है ।“ पीछे हमने लिखा है कि यज्ञ का मतलब “अध्वर” होता है मतलब हिंसा रहित। यज्ञ के ब्राह्मण का पद अध्वर्यु इस “अध्वर” से ही आया है अर्थात अध्वर्यु वह होता है जो यज्ञ में इस बात को प्रमुखता से देखता है कि कहीं यज्ञ में किसी तरह की हिंसा न हो, यहां तक वाक् की हिंसा तक को महापातक माना गया है । स्पष्ट है यह श्रुतियों के खिलाफ है । सनातन हिन्दू धर्म श्रुतिसम्मत है इसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं । महात्मा गांधी नें अहिंसा को सत्य का आधार माना है और यह “सत्यमेव जयते” के अन्तर्गत ही है । हमारे महावाक्य “वसुधैव कुटुंबकम ” के भी अन्तर्गत यह बात आ ही जाती है । गढ़ी माई जैसी घोर बलि जैसी प्रथाएं अनपढ़, अज्ञानी पुजारियों के कारण हिन्दू धर्म में चली आयीं । इस तरह के अन्धविश्वास असभ्य और जंगली लोगों में ही पाये जाते हैं । यदि हम स्वयं को संस्कृत और सभ्य मानते हैं तो हमें इस तरह की प्रथाओं और कर्मकांडों का विरोध ही नहीं बल्कि उसे बलपूर्वक ख़त्म करना चाहिए ।

–प्रजातंत्र लाइव अखबार का  Nov 29, 2014 अंक में छपा हुआ लेख 

Posted by: Rajesh Shukla | November 15, 2014

सेल्फ़ी वाला पीएम

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नरेंद्र मोदी क्या चाहते हैं, यह केवल उनको ही  स्पष्ट नहीं है जो अस्पष्ट दिमाग रखते हैं! हर व्यक्ति का मूल्यांकन उसके अतीत के आधार पर ही होता हैं, यह बात राजकिशोर के राष्ट्रीय  सहारा में लिखे लेख “मोदी के भीतर एक और मोदी” के ठीक उलट है और इसकी ताकीद स्वयं नरेंद्र मोदी करते हैं ! उन्होंने जनता से वोट भी अपने अतीत के आधार पर ही, पूर्व में किये गए कर्मों पर ही माँगा । गोधरा दंगा सेक्युलर लोगों के लिए जघन्य अपराध था लेकिन मोदी ने इसे कभी अपराध नहीं माना। उन्होनें इसका उपयोग हिंदुत्व का हीरो की छवि निर्मित करने में किया और उसे भुनाया भी । उनका अतीत का जीवन दो धरातल पर निर्मित हुआ है- एक संघ कार्यकर्ता के बतौर दूसरा बतौर गुजरात मुख्यमंत्री। अतीत के खोल से बाहर निकलना आसान नहीं होता चाहे वह अतीत कैसा भी हो। यह ध्यान रहे कि संघ  में मात्र सदस्य  नहीं होते  बल्कि उनका सम्बन्ध एक सम्बन्धी का होता है। संघ  में आने वालों के साथ खून का रिश्ता होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है। नरेंद्र मोदी संघ की निर्मिती हैं उनमें संघ बसता है , संघ की  सोच उनके अस्तित्व में  घुलमिलकर एक रस हो गयी है ! इसलिए इस अतीत से मुक्ति का प्रश्न ही कहाँ उपस्थित होता है ! Read More…

Posted by: Rajesh Shukla | August 26, 2014

Hired for Love Jehad!

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A Hindu teacher at the village madrassa of a village Sarawa of Hapur Uttar Paradesh alleges that she was kidnapped, gang-raped and forcibly converted. She managed to escape from a madrassa in Muzaffarnagar and return home to narrate her story to her family. Her family filed a police case and those named in the FIR have been arrested. This includes the village pradhan Nawab, Sanahullah and a local girl, Nishat. You can sense an undercurrent of fear among Hindus: that once the police forces are removed from the area, Muslims might retaliate. #openmagazine

According to parents, behind such conversion which is taken under Love Jehad, there are Muslims involved supported by Samajwadi Party government. An another Man from Hapur who runs a local news paper says that behind #lovejehad there is huge money involved. Sickularists are hiring smart Muslim boys to wage LoveJehad against Hindus. According to him the tariff for Love Jehad is as follows:

Rs-7 lakh to capture and convert a Brahmin girl.

Rs-7 lakh to capture and convert a kashtriya Girl.

Rs-8 lakh to convert a Vaishya girl.

Rs-8 lakh to convert a Jain girl.

Rs-5 lakh for Hindus of other casts.

This is a horror.

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<यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम>

श्रीकृष्ण ने भगवदगीता में क्या कहा है “न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः” केवल मनुष्यों मे नीच,अधम,मूढ ही मुझ वासुदेव की पूजा न कर पीरसीर की पूजा करते है”। जिस धर्म और परम्परा की रक्षा के लिये द्वारका पीठ के शंकराचार्य श्री स्वरूपानन्द जी लड रहे है वह भगवान द्वारा स्थापित सनातन वैदिक परम्परा है! कृष्ण जी ने कहा था अर्जुन से “”एवं परम्परा प्राप्त मिमं” यह परमतत्व का ज्ञान जो मै दे रहा हूँ वह परम्परा से प्राप्त है। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी ने सनातनधर्म की रक्षा करने का जो वचन पीठ पर बैठते समय लिया था उसे निष्ठा से निभा रहे है| जो कोई भी ईश्वरीय सनातन हिन्दू धर्म की परम्परा के खिलाफ खडा होगा वह हिन्दू विद्वेषी करार दिया जायेगा! Read More…

Posted by: Rajesh Shukla | June 27, 2014

What is Yantra?

Tantra as its root meaning indicates, is a means of spreading or propagating knowledge –knowledge both spiritual and that which is conducive to worldly happiness. It is a means to attain chaturvarga-the four objectives of knowledge. Tantras claim equal sanctity and importance as Vedas; even Agmas speak about their greatness.  Agama texts say that all the Arsha or Arya spiritual literature dwell in Maya and not fit for absolute knowledge. However Yantra-Mantra aspect of Vedic and Tantrik paths of spiritual practice comes to them from ancient ritualism found in pre-Vedic age.  Pre-Vedic form of Tantrik practice still persist in Damar and various other minor forms of Tantras in which howling, crying; anything can be a mantra. Ancient form of Yantra is found in the form of Vedic Yajna-vedi and Mandala, perhaps, various forms of Yantras that have become universal in Tantra tradition would have been evolved from it.

Yantra according Indian metaphysics is geometric representation of energies.  In Hindu Tantras, Mantra is said to be the rays of consciousness “Mantras chinmarichayah-Shiva Sutra” that Yantra represents figuratively. Indian seekers after truth believed that everything in this world represents the abstract energies of goddess, hence, every visual phenomena is a form of Yantra. Every visual form is a Yantra.   Read More…

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ विचारधारात्मक स्तर पर भले ही एक आदर्शवादी संगठन हो लेकिन अपनी राजनीति और संगठनात्मक विस्तार में यह किसी वामपंथी क्रन्तिकारी संगठन से काम नहीं रहा है । ऐसा भी नहीं है की संघ अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा की आदर्शवादिता का कोई बेहतर आदर्श सामने रखता हो। यह मूलभूत रूप से समझौतावादी और मौकापरस्त संगठन रहा है जिसकी पुष्टि इसका ८५ साल से अधिक पुराना इतिहास करता है। राजनीति में यह भौतिकवादियों की तरह यथार्थवादी और अन्य पार्टियों से ज्यादा व्यावहारिक रहा है। अपनी राजनैतिक गत्यात्मकता को संघ ने लगातार धारदार बनाया है, भौतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ठाला है और सदैव आगे ही बढ़ा है । यह सबको ज्ञात है कि जब तक नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक उन्होंने संघ को गुजरात में प्रभावी नहीं होने दिया बल्कि कितने ही संघ के दिग्गजों को किनारे लगाया। संघ से उनके सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं रहे है लेकिन स्थितियां शायद अब वैसी ही नहीं है । मोदी अंतराष्ट्रीय पूंजी  का दबाव में काम करने को बाध्य होंगे और दूसरी तरफ संघ की आर्थिक  पॉलिसी बदल जाने से यह टकराव  शायद अब न हो | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सत्ता लोलुपता अब बढ़ गयी है ! संघ ने समझौता किया है और उसी नरेन्द्र मोदी को आगे ले आया जिससे वह पीड़ित था, यह हमने विगत चुनाव में देखा ! नरेंद्र मोदी को अपना राष्ट्रीय नेता स्वीकार कर संघ ने वास्तव में अपनी आर्थिक विचारधारा के स्तर पर समझौता किया, संघ ने मोदी की उस आर्थिक विचारधारा को स्वीकार किया जो संघ की स्वदेशी अर्थव्यवस्था की विचारधारा से बहुत अलग है। Read More…

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देवगुरु वृहस्पति ने याज्ञवल्क्य से एक समय   पूछा ” सर्व प्रसिद्द कुरुक्षेत्र कहाँ है? वह क्षेत्र जहाँ देवता यजन करते हैं? क्षेत्र जो सभी प्राणियों के लिए ब्रह्म सदन हैं? ” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया ” हे गुरु ! अविमुक्त वह क्षेत्र है जहाँ देववर्ग यजन करता है, यही कुरुक्षेत्र है जहाँ मृत्यु काल में प्राणियों को रूद्र तारक मंत्र उपदेश करते हैं जिससे मुक्त होकर वह अमरत्व प्राप्त कर लेता है।” ज्ञातव्य है कि वाराणसी को भी पुराणो में अविमुक्त क्षेत्र कहा गया हैं। पुराणो में यह प्रसिद्ध है मृत्यु को प्राप्त जीवात्माओं को भगवान शिव इसी क्षेत्रमें तारक मंत्र का उपदेश देते हैं जिससे उनको उत्तम गति प्राप्त होती है। याज्ञवल्क्य उपदेश में स्पष्ट करते हैं कि अविमुक्त क्षेत्र अनंत और अव्यक्त आत्मा का सदन है। इसी क्षेत्र में प्राणियों को आत्मउद्धार के लिए उपासना करनी चाहिये। इस क्षेत्र की उपस्थिति समष्टि में काशी और व्यष्टि में मानव देह है। Read More…

Posted by: Rajesh Shukla | December 17, 2013

A house in the heart of the multitude..

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Gustave Caillebotte – Paris Street; Rainy Day

The poet parallels the prostitute parallels the flâneur parallels the bohemian, all engaged in universal prostitution created by Consumerism.  Read More…

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